

advertisement
बीसीसीआई अध्यक्ष शशांक मनोहर द्वारा शहरयार खान को भारत बुलाए जाने के बाद से देश में एक बार फिर क्रिकेट पर पॉलिटिक्स शुरू हो गई है. बीसीसीआई कोई निर्णय लेती दिख नहीं रही है.
कभी लगता है कि जल्द ही भारत-पाक के बीच एक सीरीज खेली जा सकती है तो कभी लगता है कि हाल के दिनों में ऐसा संभव नहीं होगा.
पांच श्रृंखलाओं का करार
भारत-पाक के बीच क्रिकेट न खेले जाने की नई वजह सयुंक्त अरब अमीरात है. ये बात जगजाहिर है कि 2009 के बाद से यूएई पाकिस्तान के लिए होम पिच की तरह हो गई है. यूएई को अवैध धंधों और सट्टेबाजी से जोड़कर देखने वाले लोग बड़ी आसानी से भूल जाते हैं कि आईपीएल 2014 के शुरुआती मैच भी यूएई में ही हुए थे.
असल बात ये है कि पाकिस्तान के पास अब ज्यादा समय नहीं है क्योंकि भारत के पास दिसंबर से जनवरी के बीच सिर्फ 22 दिनों का टाइम है. लेकिन बीसीसीआई की तरफ से इस सीरीज को हरी झंडी न मिलने की वजह से ये मौका भी हाथ से जाता दिख रहा है. बीसीसीआई भी भारत सरकार से हरी झंडी मिले बिना किसी सीरीज के लिए हामी नहीं भर सकती.
क्रिकेट पर ही देशभक्ति की जिम्मेदारी क्यों?
भारतीय क्रिकेट के चार स्पिन धुरंदरों (इंडियन स्पिन क्वार्टेट के नाम से फेमस) ने भी अपने करियर के अंतिम दौर में ही पाकिस्तान के खिलाफ बॉलिंग की. घातक पाक बॉलर वसीम अकरम ने भी 1989 से 1999 के बीच सचिन तेंदुलकर के खिलाफ न खेलने के प्रति अफसोस जताया है.
द्विपक्षीय क्रिकेट को लेकर विरोध 1980 में ही खत्म हुआ और दोनों देशों ने शारजाह में हर चार महीने में एक दूसरे का सामना किया.1990 में द्विपक्षीय क्रिकेट बंद होने से एक बार फिर दोनों देशों के बीच क्रिकेट होने की हर तरह की उम्मीद खत्म हो गई.
अब एक बार फिर से वही स्थिति बनती दिख रही है क्योंकि पिछले सात सालों से दोनों देशों के बीच एक भी द्विपक्षीय मैच नहीं खेला गया है. अब जरूरी है कि भारत अपना बिग बॉस एटीट्यूड छोड़कर सभी देशों के साथ खेलना शुरू करे.
इसकी शुरुआत पाकिस्तान के साथ यूएई में खेलकर की जा सकती है. फिर बांग्लादेश को पहली बार टेस्ट सीरीज के लिए भारत बुलाया जा सकता है. आखिरकार आईसीसी के फुलटाइम मेंबर होने के नाते क्रिकेट का प्रमोशन करने का जिम्मा भारत पर भी आता है.
Published: undefined