

advertisement
"आधुनिक समाज में हम किसी व्यक्ति में अपनी पहचान बदलने के अधिकार को स्वीकार नहीं करेंगे तो हम केवल जेंडर आइडेंटिटी डिसऑर्डर सिंड्रोम को प्रोत्साहित करेंगे". यूपी की महिला कांस्टेबल के लिंग परिवर्तन सर्जरी (Sex Change surgery) की अनुमति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस अजीत कुमार की पीठ ने ये बात कही.
कोर्ट ने जिस पहचान का जिक्र किया, उसे लेकर गोंडा की महिला आरक्षी नेहा सिंह चौहान 27 साल से जूझ रही हैं. जरा सोचिए...उन पर क्या बीती होगी? जिनका पुरुष मन, एक स्त्री को भरपूर सम्मान देना चाहता है, लेकिन उनके जननांग खुद स्त्री के हैं और बाकी पुरुषों का रवैया उनके प्रति इतना घिनौना है. लड़का होकर किसी लड़के से ही लैंगिक अभद्रता क्या महसूस कराती है, इसे हम आप सोच भी नहीं सकते.
दरअसल, यह कहानी है यूपी पुलिस विभाग में तैनात गोंडा की महिला आरक्षी नेहा सिंह चौहान की. वह जेंडर डिस्फोरिया से पीड़ित हैं और खुद को एक पुरुष के रूप में पहचानती हैं. वह सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी करवाना चाहती हैं.
नेहा सिंह ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर कर लिंग परिवर्तन की अपील की है. उनके अलावा गोरखपुर की एक महिला आरक्षी सोनम भी हैं, जिन्होंने लिखित शिकायत दी है, लेकिन न्यायालय जाने से पहले वो नेहा सिंह चौहान के मामले के फैसले का इंतजार कर रही हैं.
बता दें, यूपी पुलिस मुख्यालय ने मध्य प्रदेश पुलिस से इस मामले में राय मांगी है. दरअसल, मध्य प्रदेश में भी बिलकुल इसी तरह का एक मामला सामने आया था, जिस पर शीर्ष अदालत के आदेशों और मनोचिकित्सकों की सलाह पर एक महिला आरक्षी को लिंग परिवर्तन की मंजूरी दी गई थी.
नेहा बताती हैं कि जीवन के सबसे कठिन पलों में से हैं वो पल...जब उन्हें खुद के कपड़े बदलने के लिए आंख बंद करनी पड़ती थी...जब लाइट बंद करके नहाने की शुरुआत की...जब स्कूल में स्कर्ट की जगह नेकर पहनने का विकल्प ढूंढा...जब लड़के ने आकर प्रेम पत्र थमा दिया.
नेहा को सबसे ज्यादा संघर्ष उनके परिवार से करना पड़ा, जिसमें उनके भाई हमेशा उन्हें नेहा ही बने रहने देना चाहते हैं. वह बताती हैं कि उनकी आदतों जैसे बाल न बढ़ाने, सूट न पहनने को लेकर उनके भाई से अक्सर उनका झगड़ा होता था. ऐसी ही एक लड़ाई में उनके भाई ने कहा था कि तुम्हारे जैसे लोग एक दिन आत्महत्या कर लेते हैं.
इस घटना के सालों बाद जिंदगी के एक मोड़ पर जब वो कमजोर पड़ीं और उन्होंने खुद का साथ छोड़ने का फैसला कर सुसाइड नोट लिखा तब उन्हें अपने भाई की वो निराशापूर्ण बात याद आई और उन्होंने कभी भी ऐसा न करने का फैसला किया.
नेहा बताती हैं कि 12वीं के बाद घर वालों का दबाव बढ़ने लगा. उनसे कहा जाने लगा कि लड़की की तरह रहना सीखो...बाल बढ़ाओ और सूट पहनो. कुछ दिन की बहस के बाद एक रोज भाई ने दर्जी को जबरदस्ती घर बुलाकर सूट सिलवाया और पहनकर चौराहे तक जाने को कहा, जिसके जवाब में नेहा ने कहा कि वो सूट पहन लेंगी, अगर उनका भाई भी पहने, क्योंकि वो भी भावनात्मक तौर पर वैसा ही महसूस करती हैं जैसा उनका भाई. इस बहस के बाद उन्होंने सूट को कैंची से काट दिया और उसके बाद वर्दी के तौर पर भी पैंट शर्ट पहना.
नेहा के मुताबिक, उनके दोस्त उन्हें कभी भी स्त्रीलिंग शब्दों से संबोधित नहीं करते. नेहा कहती हैं कि कभी-कभी विकल्प नहीं होता तो उनके दोस्त और करीबी कुछ नहीं कहते लेकिन स्त्रीलिंग पर्याय इस्तेमाल नहीं करते. संवाद में...और क्या हो रहा है...ऑफिस कैसा रहा...तुम ठीक तो हो....जैसे वाक्यों से काम चला लेते हैं जिससे किसी भी तरह का लिंग की तरफ इशारा नहीं करते. लोगों के लिए यह छोटी बात हो लेकिन नेहा को यह छोटी सी कोशिश बहुत सुकून और सम्मान देती है.
कई बार उनके शरीर और हाव भाव को मेल न खाता देखकर कुछ लोग उनका मजाक उड़ाने की कोशिश करते हैं लेकिन नेहा इसे अपने तरीके से संभाल लेती हैं. वह कहती हैं कि एक बार किसी दुकान पर अंडरगारमेंट्स लेने गईं तो उनके तौर-तरीके देखकर उन्हें लड़कों के अंडर गारमेंट्स दे दिए तो साथ के लोगों ने आश्चर्यजनक तरीके से दुकानदार को देखा. फिर क्या दुकानदार पूछ बैठा कि क्या हुआ....लड़का हो या लड़की तो नेहा ने जवाब दिया....पास आओ...कंटाप मार के बताएं...तेज पड़ी तो लड़का नहीं तो लड़की. वैसे बता दूं कि नेहा अभी तक सैंडो ही पहनती हैं.
नेहा के सपने ज्यादा बड़े नहीं हैं. लिंग परिवर्तन का वो सिर्फ उद्देश्य बताती हैं कि मुझे अपनी भावनाएं अपने वास्तविक शरीर के साथ जीनी हैं. दिल करता है कि गोवा जाऊं और शर्टलेस होकर घूमूं. महिला दोस्तों के साथ मजाक कर सकूं और सबसे बड़ी बात खुद को आईने में देखकर खिलखिला सकूं.
इंस्टिट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलाइड साइंसेज के पूर्व निदेशक डॉक्टर निमेष देसाई से बातचीत पर आधारित: लिंग परिवर्तन की प्रक्रिया में शरीर के साथ सब्र को भी कई चरणों से गुजरना होता है.
यदि कोई पुरुष से महिला बनता है तो उसके शरीर के भागों से ही सर्जरी के जरिए महिलाओं के अंग बना दिए जाते हैं. इस प्रक्रिया में करीब 4 घंटे का समय लगता है. इसके बाद ब्रेस्ट सर्जरी की जाती है जिसमें करीब 2 घंटे का समय लगता है. ये दोनों ऑपरेशन 3 से 4 महीने के अंतराल में किए जाते हैं.
खुद को पहचानने से शुरू हुई यह प्रक्रिया सिर्फ सर्जरी पर खत्म नहीं होती. इस राह पर चलने के लिए इरादे और वायदे दोनों मजबूत होने चाहिए. दरअसल, इसके लिए पहले मनोचिकित्सक के सामने आपको अपनी भावना सिद्ध करनी पड़ती है और प्रमाण-पत्र मिलने के बाद ही ऑपरेशन करवाया जा सकता है. यह सर्जरी अपरिवर्तनीय हैं. इसी के साथ सर्जरी कराने वाला वाला कभी बायोलॉजिकल माता-पिता नहीं बन सकता.
भारत में लिंग परिवर्तन को लेकर न तो संसद और न ही राज्य विधानसभाओं द्वारा कोई निश्चित कानून या नियम पारित किए गए हैं. हालांकि सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के कुछ निर्णय लिंग परिवर्तन को एक संवैधानिक मान्यता के रूप में जरूर स्थापित करते हैं. इन्हीं में से एक है साल 2014 में आया सुप्रीम कोर्ट का आदेश, जिसमें नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी बनाम केन्द्र सरकार व अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर और तीसरे लिंग (Third Gender) को संवैधानिक दर्जा और मान्यता दी है.
वहीं संसद द्वारा साल 2019 में पारित 'ट्रांसजेंडर पर्सन्स एक्ट' के सेक्शन 15 के तहत सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी (SRS) को मान्यता देते हुए सरकारों को जिम्मेदारी दी गई कि एसआरएस के पहले और बाद की प्रक्रिया के दौरान पूरी मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं.
इसी प्रकार राजस्थान हाईकोर्ट ने साल 2021 में चंदर पाल सिंह बनाम द चीफ सेक्रेटरी, गवर्नमेंट ऑफ राजस्थान के मामले में एक महिला को लिंग परिवर्तन की इजाजत देने के साथ ही सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी (SRS) की मंजूरी दी थी. इसके अलावा पूर्वोत्तर रेलवे के इज्जतनगर मंडल में कार्यरत राजेश कुमार अब सोनिया पांडेय के नाम से नौकरी कर रही हैं. उन्होंने महिला होने के अधिकार की लड़ाई 27 महीने तक लड़ी थी.
भले ही लिंग परिवर्तन को लेकर देश में कोई निश्चित कानून नहीं बनाया गया है ना ही कोई विधेयक पास हुआ है लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के विभिन्न फैसले लिंग परिवर्तन को संवैधानिक मान्यता जरूर देते हैं.विप्लव अवस्थी, अधिवक्ता, नई दिल्ली
अगर भारत से इतर बात करें तो बाकी देशों की इस मिली जुली राय और नियम हैं। शुरू करते हैं रूस के हालिया फैसले से जहां राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एलजीबीटीक्यू समुदाय के संदर्भ में एक नया कानून बनाया है, जिसमें लिंग बदलने के लिए लिंग पुनर्मूल्यांकन सर्जरी कराने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. इसी के साथ यह इस आधार पर किए गए पुराने विवाहों को भी रद्द कर देगा और ट्रांसजेंडर माता-पिता को बच्चे गोद लेने की अनुमति भी नहीं देता है. वहीं अमेरिका में भी लिंग परिवर्तन को अवैध माना गया है और इसको लेकर सख्त कानून हैं.
इसके अलावा विश्व शतरंज की सर्वोच्च संस्था फिडे ने पुरुष से महिला बने खिलाड़ियों पर महिला प्रतियोगिताओं में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया है. महासंघ ने कहा कि यदि कोई महिला खिलाड़ी लिंग परिवर्तन करवाकर पुरुष बन जाता है तो उसके खिताब वापस ले लिए जाएंगे, लेकिन अगर खिलाड़ी लिंग परिवर्तन करवाकर पुरुष से महिला बन जाता है तो उसके पिछले खिताब वैसे ही बने रहेंगे.
दूसरी तरफ कुछ देश ऐसे हैं जो इस मामले पर उदार दृष्टि रखते हैं. मसलन, स्कॉटलैंड में लिंग परिवर्तन में कानूनी उम्र 16 वर्ष कर दी गई है. वहीं स्वीडन 1972 से लिंग परिवर्तन के कानूनों को लेकर उदारवादी है जबकि फिनलैंड भी में ऐसे लोगों के लिए कानूनी स्वतंत्रता है. डेनमार्क यूरोप का ऐसा पहला देश रहा, जिसने लिंग परिवर्तन से संबंधित मसलों पर सबसे पहले सकारात्मक रवैया अपनाया. इसके बाद माल्टा, आयरलैंड, नॉर्वे, बेल्जियन, पुर्तगाल ने भी कदमताल किया.
(यहां लिखे विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट हिंदी का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं . प्रियम राजवंशी राजनीति-महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर लगातार लिखती रहती हैं. बुंदेलखंड में गर्भपात से जुड़े मुद्दों पर स्टिंग ऑपरेशन सहित कई रिपोर्ट्स हिंदुस्तान, दैनिक जागरण अखबार के लिए किया. यूपी में सेनेटरी नैपकिन से जुड़े मुद्दे पर रिपोर्टिंग के लिए उन्हें लाडली मीडिया अवॉर्ड मिला है. चुनाव में यूपी-हरियाणा के गांवों से कई ग्राउंड रिपोर्ट्स की. इंडिया न्यूज, जी न्यूज सहित दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान और दैनिक जागरण के साथ काम करने का लंबा अनुभव है)
Published: undefined