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डॉक्टर और मरीज के बीच सबसे जरूरी चीज है भरोसा, जो लगभग खत्म हो गया है. महंगे इलाज की वजह से लोग प्राइवेट अस्पतालों को शक की निगाह से देखते हैं. उन्हें लगता है कि पैसे ऐंठने के लिए अनाप-शनाप टेस्ट करवाए जाते हैं, अस्पताल में उन्हें बिना जरूरत या अधिक समय तक एडमिट रखा जाता है. ओवरचार्जिंग के आरोप आए दिन लगते रहते हैं.
अमेरिका में ये सब पहले हो चुका है. 1965 से पहले वहां के स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल मरीज रेफर करने वाले डॉक्टर को रिश्वत देते थे, जिस डॉक्टर को सर्जरी करनी होती थी, उसके बदले बेहोश मरीज की सर्जरी उनका सहकर्मी करता था. इसके बदले सर्जन अपने सहकर्मी को फीस का एक छोटा हिस्सा देता था. इससे भी बुरी बात ये थी कि बिना बात सर्जरी की जाती थी. आज भारत में भी ऐसी ही शिकायतें सुनने को मिल रही हैं.
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) की तरह अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (एएमए) ऐसी गड़बड़ियों पर अंकुश नहीं लगा पा रहा था. 1955 में एएमए ने एक रिपोर्ट में डॉक्टरों की कड़ी आलोचना की थी.
उसने रिपोर्ट में लिखा था-
उस वक्त के ओपिनियन पोल से पता चला कि अमेरिकी मानते थे कि डॉक्टर उनसे बहुत अधिक पैसे ले रहे हैं. मीडिया में भी ऐसी खबरें भरी रहती थीं.
निक्सन ने 1969 में अमेरिका में जो किया था, वेस्ट बंगाल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट उसी दिशा में उठाया गया एक कदम है. इसमें कहा गया है कि सरकार प्राइवेट हेल्थकेयर इंस्टीट्यूशंस की निगरानी करेगी. वो तय करेगी कि वे कितना चार्ज कर सकते हैं. इसमें ये भी कहा गया है कि अस्पतालों को इमरजेंसी मामलों में इलाज करना होगा, भले ही मरीज उसके लिए पैसा चुकाने की हालत में ना हो.
निक्सन के दखल देने के बावजूद अमेरिका में हेल्थकेयर सर्विसेज की हालत बहुत नहीं सुधरी. इसलिए ओबामाकेयर नाम की योजना शुरू हुई. अमेरिका अभी भी मरीजों और डॉक्टरों के बीच भरोसे की कमी दूर करने की कोशिश कर रहा है. वो कम पैसों में लोगों के इलाज का रास्ता तलाश रहा है.
क्या हमें इस मामले में अमेरिका का अनुशरण करना चाहिए या अपना रास्ता खुद तलाशना चाहिए?
हमें इतिहास से सीखना चाहिए. हेल्थकेयर सर्विसेज के पूंजीवादी ढांचे की आलोचना से कुछ हाथ नहीं लगेगा. हमें ऐसे स्ट्रक्चर को बढ़ावा देना चाहिए, जिसमें सेवाओं के बदले वाजिब कीमत ली जाए. इसके पहले कदम के तौर पर सच्ची जवाबदेही तय की जानी चाहिए. कॉरपोरेट वर्ल्ड की इसकी परवाह नहीं होती. एनरॉन, लीमैन ब्रदर्स, सत्यम जैसे मामलों से ये बात साफ हो जाती है. हमें अच्छे कॉरपोरेट गवर्नेंस के साथ क्लिनिकल गवर्नेंस को बढ़ावा देना चाहिए. अच्छे क्लिनिकल गवर्नेंस का मतलब स्वास्थ्य सुविधाओं में लगातार सुधार है. इससे डॉक्टरों और अस्पतालों की जवाबदेही का रास्ता बनेगा.
अस्पतालों के बोर्ड का ध्यान मरीजों की सुरक्षा और अच्छी सर्विस पर होना चाहिए, ना कि मुनाफाखोरी पर. बोर्ड को लोगों के प्रति जवाबदेह बनाना होगा. उन्हें सेफ्टी और क्वॉलिटी डेटा की जानकारी सार्वजनिक करने को कहना होगा. उन्हें समझाना होगा कि क्वॉलिटी हेल्थकेयर से ही फाइनेंशियल ग्रोथ मिलेगी.
फिजिशियन के ऑर्डर के बिना हेल्थकेयर सिस्टम में कुछ भी नहीं होता. ऐसे में मरीज का इलाज और देखभाल उसकी जवाबदेही होनी चाहिए. किसी फिजिशियन या अस्पताल के लिए वाजिब फीस क्या होनी चाहिए? फीस तय करने या रेट कंट्रोल इसका हल नहीं है. इससे फ्रॉड के नए तरीके ईजाद किए जाएंगे. अमेरिका में ऐसा हो चुका है. क्या हमें इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए नए सोशल कॉन्ट्रैक्ट की जरूरत है?
द जर्नल ऑफ जनरल इंटरनल मेडिसिन ने इसके लिए एक नए सोशल कॉन्ट्रैक्ट का सुझाव दिया है. इससे फिजिशियन को वाजिब आमदनी होगी और उसकी स्वायत्तता भी बनी रहेगी. इसकी एवज में उसे सच्ची जवाबदेही उठानी होगी. क्या हम इस समस्या को सुलझाने के लिए नए उपाय ढूंढने को तैयार हैं या हम उन्हीं गलतियों को दोहराएंगे, जो पहले की जा चुकी हैं.
(डॉक्टर सुरेश रामासुब्बन पल्मनरी और क्रिटिकल केयर मेडिसिन के सीनियर कंसल्टेंट हैं. यहां दिए गए विचार उनके अपने हैं. इसमें क्विंट की सहमति होना जरूरी नहीं है)
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