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बिरसा मुंडा ट्रेंड के पीछे वो लड़ाई जो अंग्रजों के समय से है जारी

पढ़िए- कैसे आदिवासियों के ‘भगवान’ बन गए बिरसा मुंडा?

अनुज कुमार सिन्हा
नजरिया
Published:
अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विरोध करने वाले बिरसा मुंडा
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अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विरोध करने वाले बिरसा मुंडा
(फोटो: @PiyushGoyal)
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15 नवंबर यानी बिरसा मुंडा का जन्मदिन. झारखंड राज्य का स्थापना दिवस. इसी से बिरसा मुंडा के कद का पता चलता है. बिरसा मुंडा के जन्म दिन पर ही झारखंड राज्य का गठन यह साबित करता है कि बिरसा मुंडा काे लाेग कितना पूजते हैं, सम्मान करते हैं और उनका झारखंडियाें के लिए क्या महत्व है?

आदिवासी समाज (कह सकते हैं कि झारखंडी समाज) इन्हें भगवान मानता है. अन्य समुदायाें में भी उतने ही लाेकप्रिय हैं. अंग्रेजाें और शाेषक जमींदाराें के खिलाफ बिरसा मुंडा ने 19वीं शताब्दी के अंत में उलगुलान किया. रांची, खूंटी, तमाड़, बंदगांव, चाईबासा के पूरे क्षेत्र में बिरसा मुंडा के अनुयायियाें ने अंग्रेजाें और शाेषकाें के खिलाफ संघर्ष किया था. डाेंबारी हिल पर निर्णायक लड़ाई हुई थी.

बाद में बिरसा मुंडा काे गिरफ्तार कर लिया गया था और रांची जेल में 9 जून, 1900 काे मात्र 25 साल की उम्र में ही उनकी माैत हाे गयी थी. हालांकि, अंग्रेजाें ने यह तर्क दिया था कि बिरसा मुंडा की माैत डायरिया के कारण हुई लेकिन इस तर्क काे आज भी मानने काे काेई तैयार नहीं है. यह रहस्य आज भी बना हुआ है कि बिरसा मुंडा की माैत का असली कारण क्या था?

कैसे आदिवासियों के ‘भगवान’ बन गए बिरसा मुंडा?

सच यह है कि आज तक बिरसा मुंडा के कद का काेई आदिवासी नेता पूरे देश में पैदा नहीं हुआ. देश के एकमात्र आदिवासी नेता हैं, जिन्हें भगवान का दर्जा मिला हुआ है. एक मात्र आदिवासी नेता जिनकी तस्वीर संसद में लगी हुई है. आज स्थिति यह है कि झारखंड की राजनीति बगैर भगवान बिरसा मुंडा का नाम लिए चल नहीं सकती. चाहे सत्ता पक्ष हाे या विपक्ष, दाेनाें यह संदेश देना चाहते हैं कि भगवान बिरसा मुंडा के सपनाें काे वह ही पूरा कर सकता है.

दरअसल, बिरसा मुंडा का पूरा संघर्ष ही जमीन हड़पने के विराेध में और शाेषण के खिलाफ था. झारखंड आदिवासी बहुल राज्य है जिसकी लगभग 26 फीसदी आबादी आदिवासियाें की है. सैकड़ाें साल से आदिवासी मानते हैं कि जंगल काे उन्हाेंने साफ कर उसे रहने लायक बनाया, इसलिए जमीन पर उनका पहला हक है.

‘जल, जंगल और जमीन’ के इर्द-गिर्द घूमती झारखंड की राजनीति

आजादी के पहले जब भी अंग्रेजाें ने जमींदाराें या राजाओं के माध्यम से लगान वसूलने का प्रयास किया, उन्हें आदिवासी समुदाय के विराेध का सामना करना पड़ा. चाहे वह बाबा तिलका मांझी का संघर्ष या हाे या फिर 1855 का संताल हूल. सिदाे-कान्हू, चांद और भैरव नामक चार भाइयाें ने संताल हूल के दाैरान अंग्रेजाें काे पानी पिला दिया था. कारण ताे जमीन और लगान का ही था.

आदिवासी समाज के लिए जमीन का क्या महत्व है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजाें काे बाध्य हाेकर छाेटानागपुर टेनेंसी एक्ट और संतालपरगना टेनेंसी एक्ट बनाना पड़ा ताकि आदिवासियाें की जमीन की रक्षा की जा सके. सीएनटी काे बने साै साल से ज्यादा हाे गए लेकिन आज भी झारखंड के लिए यह कानून बहुत मायने रखता है.

झारखंड की पूरी राजनीति ही जल, जंगल और जमीन के चाराें ओर घूमती है.

हालांकि इस कानून की धज्जियां उड़ा कर आदिवासियाें की जमीन पर कब्जा हाेता रहा. इसमें आदिवासी और गैर-आदिवासी दाेनाें रहे. इसलिए जब भी सीएनटी-एसपीटी एक्ट में बदलाव का प्रयास किया गया, झारखंड में बड़े आंदाेलन हुए, बड़ा विराेध हुआ.

जल, जंगल और जमीन आदिवासियाें के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है. बिरसा मुंडा के आंदाेलन के दाैरान ये ही ताे मुख्य मुद्दे थे. ये मुद्दे आज भी जीवित हैं और जब भी जमीन से संंबंधित काेई बात हाेती है, बिरसा मुंडा का संघर्ष सबसे पहले सामने आता है. वही आदिवासी समाज के लिए प्रेरणा का काम करता है.
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झारखंड में क्यों होता है भूमि अधिग्रहण पर विरोध?

ऐसी बात नहीं है कि झारखंड बनने के बाद से ही यह मामला उठता रहा है. आजादी के ठीक बाद झारखंड क्षेत्र में कई बड़े उद्याेग (एचइसी, बाेकाराे स्टील प्लांट आदि) लगे, कई बड़े डैम (तेनुघाट, मैथन, काेडरमा, चांडिल डैम आदि) बने. कई बड़ी आवासीय कॉलोनियां बनीं. इन सभी के लिए जमीन ली गयी. झारखंड में अधिकांश जमीन मूलत: आदिवासियाें और महताे के पास ही है. इसलिए जब जमीन का अधिग्रहण किया गया ताे आदिवासी और महताे की ही जमीन गयी. नाैकरी और पुनर्वास का विवाद नहीं सुलझा.

यही कारण है कि आज जब भी झारखंड में उद्याेग या अन्य परियाेजनाओं के लिए जमीन लेने की बात हाेती है, विराेध आरंभ हाे जाता है. काेयल-काराे प्राेजेक्ट और नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज का विराेध जगजाहिर है. इसीलिए जब झारखंड बना, ताे आदिवासियाें का दिल जीतने के लिए राजनीतिक दलाें में हाेड़ लगी.

झारखंड की राजनीति में क्या है आदिवासियों की अहमियत?

झारखंड में विधानसभा की 28 सीटें आदिवासियाें के लिए सुरक्षित हैं. 81 में 28 सीटें आरक्षित हाेने का बहुत महत्व है और हर दल इन सीटाें पर कब्जा करना चाहता है. वह जानता है कि जल, जंगल और जमीन का मुद्दा उठाये बिना आगे बढ़ना मुश्किल है.

हर दल यह भी जानता है कि जब आदिवासियाें का विश्वास हासिल करना है, ताे विकास की बात के साथ-साथ भावनात्मक मुद्दे भी हाेने चाहिए. आदिवासी समाज में यह संदेश जाना चाहिए कि उनका दल आदिवासी समाज, उनके मुद्दे, उनके पुरखाें, उनके भगवान का सम्मान करता है.

यही कारण है कि राजनीतिक दल भगवान बिरसा मुंडा से जुड़ी यादाें काे और मजबूत करना चाहते हैं.

रांची जेल, जहां भगवान बिरसा मुंडा ने अंतिम सांस ली थी, उसका जीर्णाेद्धार हाे रहा है, बड़ा पर्यटन स्थल बन रहा है. वहां बिरसा मुंडा की बड़ी मूर्ति बन रही है. यह काम बीजेपी सरकार करवा रही है. इसी प्रकार बुंडू के पास भगवान बिरसा मुंडा की 150 फीट ऊंची प्रतिमा बन रही है. इसकी याेजना आजसू नेता सुदेश महताे ने बनवाई है. ऐसे प्रयासाें का लाभ राजनीतिक दलाें काे मिलता रहा है.

आप कह सकते हैं कि झारखंड के राजनीतिक दलाें या नेताओं के मन में यह बात अंदर तक बैठ गयी है कि बिरसा मुंडा से जुड़ी यादाें काे मजबूत कर, कुछ काम कर आदिवासी समाज का समर्थन हासिल किया जा सकता है. इसलिए चाहे वे आदिवासी नेता हाें या गैर आदिवासी नेता, इसी प्रयास में कार्यक्रम तय करते हैं. इस चुनाव में भी यही दिख रहा है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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