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आज से ठीक 11 साल पहले पहली बार शशांक मनोहर का नाम क्रिकेट जगत में सुर्खियों में आया था. नागपुर में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच आखिरी मुकाबला था. मनोहर उस वक्त विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन (वीसीए) के सर्वेसर्वा थे. दोनों टीमें नागपुर पहुंची और घास वाली पिच को लेकर चल रहीं अटकलें सही साबित हुईं.
भारतीय टीम के कप्तान सौरव गांगुली तुरंत वीसीए अध्यक्ष के दफ्तर पहुंचे और क्यूरेटर से पिच की प्रकृति को बदलने के लिए जोरदार बहस की, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.
गांगुली को उस मैच के लिए अनफिट करार दे दिया गया. ऐसा कहा जाता है कि इस ‘पिच’ के जरिए मनोहर अपने प्रतिद्वंदी जगमोहन डालमिया की बीसीसीआई पर पकड़ को चुनौती देना चाहते थे.
गांगुली पर डालमिया मेहरबान थे, और कहा जाता है कि पिच का पेंच जानबूझकर डालमिया की बढ़ती पकड़ के लिए फंसाया गया था. ऑस्ट्रेलिया ने मैच में बाजी मार ली.
इसी के साथ भारतीय क्रिकेट में बदलाव शुरू हो गया. गांगुली और डालमिया दोनों को किनारे लगाया गया, और मनोहर शरद पवार के नेतृत्व में सबसे भरोसेमंद उपाध्यक्ष के रूप में उभरे.
अब शशांक के सामने एक नई चुनौती थी, गांगुली और ग्रेग चैपल की बीच मतभेद को सुलझाना. इस मसले को भी मनोहर ने ही सुलझाया. गांगुली की टीम में वापसी हुई.
लेकिन 2007 के विश्व कप में करारी हार के बाद अब जाने की बारी चैपल की थी.
यह निश्चित था कि 2008 में शरद पवार के जाने के बाद बीसीसीआई की कमान मनोहर के ही हाथ में आएगी. लेकिन उनके चार्ज संभालने के पहले ही भारतीय क्रिकेट के पुराने खिलाड़ियों की ‘जबरदस्ती’ विदाई का मामला शुरू हो गया.
इस बार भी गांगुली पहले ऐसे शख्स रहे जिन्होंने ‘स्वेच्छा से’ संन्यास ले लिया, और उनके बाद कुंबले भी चले गए. लेकिन मनोहर की दूसरी पारी की शुरुआत में भी गांगुली का टच आ ही गया.
बीसीसीआई अध्यक्ष के रूप में मनोहर के पहले कार्यकाल का सबसे कमजोर पक्ष ललित मोदी का मामला रहा, जब उन्होंने तत्कालीन सचिव एन. श्रीनिवासन के साथ मिलकर 2010 में ‘आईपीएल को साफ करने की’ मुहिम चलाई.
सारे मामले, मोदी के साथ कानूनी तकरार और आईपीएल, यह सब मनोहर के ही कार्यकाल में हुआ. लेकिन यह बात सभी भूल गए कि सारे मामलों की जड़ 2009 में दक्षिण अफ्रीका में हुए आईपीएल से ही जुड़ी थी, और यह आईपीएल मनोहर की ही निगरानी में खेला गया था.
दोस्त से दुश्मन बने एन. श्रीनिवासन के हाथों बीसीसीआई की सत्ता गंवाने के चार साल बाद एक बार फिर रविवार को मनोहर ने फिर से इस दौलतमंद खेल संस्था के शीर्ष पर पहुंच गए.
कथित तौर पर तो उन्होंने क्रिकेट से सारे नाते तोड़ लिए थे, लेकिन अंदर ही अंदर कई लोगों के लिए गाइड का काम करते रहे थे. उन्होंने स्पॉट-फिक्सिंग स्कैंडल के दौरान श्रीनिवासन और आईपीएल सीओओ सुंदर रमन की काफी कड़े शब्दों में आलोचना की थी.
मनोहर की दूसरी पारी फिर से गांगुली के टच के साथ ही शुरू हुई. यह पूर्व कप्तान उन पहले लोगों में से था जिन्होंने इस पोस्ट के लिए मनोहर के नाम का समर्थन किया था.
मनोहर के लिए पहली चुनौती भारतीय क्रिकेट में लोगों का फिर से विश्वास जगाना है. पिछले कुछ महीनों के उलट मामलों को बोर्डरूम में सुलझाने की जरूरत है न की अदालतों में.
इस समय सबसे बड़ी जरूरत आईपीएल को लेकर चल रहे मामलों को अंजाम तक पहुंचाने की है, विशेषकर दो टीमों के निलंबन के मामले को. इसके अलावा कई राज्य एसोसिएशनों में भी मतभेद चल रहे हैं.
भारतीय क्रिकेट में आया बेहिसाब पैसा भी इन अंदरुनी झगड़ों का कारण है और इस वजह से इस खेल की आत्मा को नुकसान पहुंच रहा है. इस झंझट से निकलने का कोई न कोई रास्ता निकालना ही होगा.
इसके अलावा जस्टिस लोढ़ा पैनल का भी दबाव है, जिसने बीसीसीआई में संगठनात्मक सुधारों का सुझाव दिया है.
इन सभी मामलों के केंद्र में सौरव गांगुली रहे हैं. मनोहर को गांगुली के मदद की जरूरत पड़ सकती है (जी हां फिर से)! गांगुली हाल के समय में बेहद ही महत्वपूर्ण व्यक्ति रहे हैं और वह जस्टिस मुद्गल पैनल में भी शामिल थे.
गांगुली की क्रिकेटीय रणनीति और मनोहर की बकवास न सहने की आदत एक साथ मिल जाएं तो भारतीय क्रिकेट में फिर से नई जान फूंकी जा सकती है.
मनोहर न तो ईमेल का इस्तेमाल करते हैं और न ही उनके पास मोबाइल फोन है. उनके लिए पहला पासपोर्ट भी सन 2007 में ही जारी हुआ था. हालांकि अब उन्हें भारतीय क्रिकेट की छवि से जुड़े मामलों को देखने के लिए हर संभव तरीके की जरूरत पड़ सकती है.
यदि इस बार वह कोई रास्ता निकाल पाने में नाकाम साबित होते हैं, तो भारतीय प्रशंसक उस खेल से हमेशा के लिए दूर हो जाएंगे जिसे वे बेहद प्यार करते हैं.
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