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इसकी शुरुआत मेरी ओर से हंसी-मजाक वाले ट्वीट के तौर पर हुई. प्रोफेसर योगेंद्र यादव को लेकर मजाक कर रहा था कि वे @cvoterindia’s के अंकों को गंभीरता से नहीं लेते. मैं सीएसडीएस और प्रोफेसर यादव के बीच बातचीत में अचानक टपक पड़ा. प्रोफेसर यादव के उस आकलन (बल्कि दावे) से डॉ संजय सहमत नहीं हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का भविष्य गर्त में जाता दिख रहा है.
‘असहमत होने की स्वस्थ भावना’ के साथ शेखर गुप्ता ने ‘दो होनहार शैफोलॉजिस्ट’ @YogendraYadav और @sanjaycsdsconversation के बीच बहस की जरूरत बतायी. अब मेरे लिए उन महान लोगों में खुद को शुमार कराने का एक मात्र तरीका इस बहस में घुसपैठ था ताकि दो महान सोच की महिमा से पैदा हुई रोशनी में मैं भी नहा सकूं, जिनका मैं बहुत सम्मान करता हूं. अलग-अलग एजेंसियों के लिए अलग-अलग आंकड़ों के साथ सामने आना स्वाभाविक है, खासकर सीटों के मामले में.
इसे इस रूप में समझ सकते हैं कि दोनों अध्ययन में वोट शेयर बहुत नजदीकी है और एफपीटीपी (फर्स्ट पास्ट द पोस्ट) व्यवस्था में मतदान और किसी पार्टी की जीती हुई सीटों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता. मानक नियम ये है कि जिस पार्टी को ज्यादा वोट मिलेंगे, उसे ही सीट भी ज्यादा मिलेगी, लेकिन, एफपीटीपी में संभावना इधर या उधर बराबर है.
हालांकि जब पोल पंडितों के अनुमानों में बड़ा फर्क नहीं होता है तो तह तक जाने की जरूरत महसूस होती है कि कहीं अलग-अलग इलाकों के बारे में बात तो नहीं हो रही. इसी वजह से बहस महत्वपूर्ण और दिलचस्प हो जाती है. कहानी को छोटी करें तो आप योगेंद्र यादव की पूरी स्टोरी “क्यों बीजेपी की शुरुआत 2014 के मुकाबले 100 से कम सीटों से हो रही है” यहां पढ़ सकते हैं.
जो बात मजाक में शुरू हुई थी (ट्विटर में मेरे हस्तक्षेप के दौरान) अब गंभीर हो गई, मैंने कहा मैं गेम हूं, यादव ने जवाब दिया शानदा, तो स्पष्टता के लिए क्या हम संवाद को चार सवालों में बांट सकते हैं : पहला- पूरब में बीजेपी को फायदे की उम्मीद, दूसरा- पश्चिम और दक्षिण में बीजेपी को नुकसान, तीसरा- उत्तर प्रदेश में बीजेपी को नुकसान की उम्मीद और चौथा- बाकी हिंदी प्रदेशों में बीजेपी को नुकसान, इसे बदलने या चुनौती देने के लिए आप स्वतंत्र हैं.
यादव : बीजेपी को पूरब से 2014 के मुकाबले केवल औऱ केवल फायदे की संभावना है. पूरे क्षेत्र में पार्टी ने 11 सीटें जीती थीं और, इस तरह वहां आगे बढ़ने की संभावना है. सभी विश्वसनीय पूर्वानुमान इशारा करते हैं कि बीजेपी का आधार कांग्रेस की कीमत पर ओडिशा में बढ़ा है, जबकि बंगाल में वाम मोर्चे की कीमत पर.
इस चुनाव में सवाल केवल यही है कि अतिरिक्त वोट अतिरिक्त सीटों में बदल सकती है या नहीं. वर्तमान में बीजेपी ओडिशा में अपनी ताकत बढ़ाती हुई दिख रही है, लेकिन बंगाल में नहीं. बंगाल में बीजेपी वामदलों को पछाड़कर दूसरे नंबर पर आ सकती है, लेकिन अभी वह ममता बनर्जी के एकाधिकार को चुनौती देने में पीछे है. असम में बीजेपी और अधिक नहीं बढ़ सकती, लेकिन यह उत्तर पूर्व के पहाड़ी राज्यों में कुछ और सीटें जीत सकती है. कुल मिलाकर बीजेपी इस क्षेत्र से 20 सीटें जीत सकती है.
यशवंत देशमुख (वाईडी) : निष्कर्ष से सहमत हूं, इस महीने के ताजा अनुमान बताते हैं कि इस क्षेत्र में बीजेपी को 24 सीटों का फायदा हो रहा है. यादव जो 20 अतिरिक्त सीटें बता रहे हैं उससे बहुत दूर यह (अनुमान) नहीं है, इसके लिए विस्तृत विवरण के साथ मैं पूर्वी क्षेत्र के हर राज्य का डाटा रख रहा हूं. प्रो. यादव ने यह कहते हुए कि बीजेपी पूर्वी भारत में महत्वपूर्ण ताकत बन रही है, बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाया है. बीजेपी के पक्ष में पूर्वी जोन में वोटों की जबरदस्त बढ़ोतरी के बावजूद उनका संदेह बिल्कुल सही है कि सीटों के रूप में वैसा उछाल सीट तालिका में शायद ही दिखेगा.
मई 2014 में इस क्षेत्र में एनडीए को महज 19 फीसदी वोट मिले थे और अब 16 नवंबर के हमारे आंकड़े बताते हैं कि इसमें जबरदस्त 12 फीसदी वोटों का उछाल आया है. इससे बीजेपी का वोट शेयर इस क्षेत्र में बढ़कर 36 फीसदी हो गया है. कांग्रेस अपना 19 फीसदी वोट बरकरार रखे हुए है. इसलिए कहा जा सकता है कि बीजेपी को वोटों का यह फायदा कांग्रेस के खाते से नहीं हो रहा है.
वोटों का यह उभार क्षेत्रीय दलों खासकर सीपीआई (एम) (जो पश्चिम बंगाल में घटकर क्षेत्रीय दल बन गयी है) और ओडिशा में बीजेडी के कारण दिख रहा है.
असम और त्रिपुरा में बीजेपी ने अपने बूते सरकार बनायी है. पूर्वानुमान के आंकड़े बता रहे हैं कि ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी असाधारण करती दिख रही है. ओडिशा में बीजेपी के पक्ष में करीब 38 फीसदी वोट पड़ता दिख रहा है, जो सत्ताधारी बीजेडी के 33 फीसदी के मुकाबले बहुत ज्यादा है. निश्चित रूप से बीजेपी ओडिशा में इस वोट बैंक को सीटों में बदलने को तैयार दिख रही है.
अगर यह रुझान जारी रहता है तो त्रिपुरा और असम की तर्ज पर नतीजे आ सकते हैं. यह बात भी अहम है कि बीजेपी ने बीजेडी को राजनीतिक कारणों से कभी सहयोग नहीं किया है. मगर, यही बात पश्चिम बंगाल के बारे में नहीं कही जा सकती.
टीएमसी शासित राज्य में चौंकाने वाला नजारा है. यहां सीपीआई (एम) और कांग्रेस पूरी तरह से खत्म होती दिख रही है. उनके वोट ममता बनर्जी के खिलाफ बीजेपी की ओर रुख कर रहे हैं. इसलिए यह चुनाव जितना ज्यादा दो ध्रुवों में होगा, उससे टीएमसी को उतना अधिक लाभ होगा.
अगर इसी तरीके से रुझान बरकरार रहता है तो बीजेपी को 35 फीसदी वोट मिल सकता है और टीएमसी को 45 फीसदी. बिल्कुल, बीजेपी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ मुख्य विपक्षी पार्टी हो सकती है, लेकिन क्या 35 फीसदी वोट सीटों में तब्दील हो पाएगी? ऐसा नहीं लगता.
मैं यहां प्रोफेसर यादव से पूरी तरह सहमत हूं कि पश्चिम बंगाल में वोटों मे जबरदस्त उछाल के बावजूद बीजेपी की सीटें शायद न बढ़े. 16 नवंबर के हिसाब से तस्वीर नहीं भी हो सकती है. हमारा गणित 42 सीटों वाले पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए तकरीबन 9 सीटें देख जोड़ पा रहा है, लेकिन इस बात की अधिक संभावना है कि 35 फीसदी वोटों के बावजूद बीजेपी को एक भी सीट ना मिले. दो ध्रुवों में मुकाबला होने पर 10 फीसदी वोट का अंतर बहुत बड़ा हो जाता है जिसे पाटना मुश्किल होता है.
टीएमसी से वोट कितना खिसकेगा, इसी से गेम में वास्तविक बदलाव होगा, जिस क्षण यह अंतर घटना शुरू होगा 10 प्रतिशत से 7 प्रतिशत, फिर 5 प्रतिशत और इसी तरह आगे, बीजेपी के लिए सीटें तेज रफ्तार से बढ़ती चली जाएंगी. इसके पीछे क्षेत्रीय कारक होते हैं.
विभिन्न क्षेत्रों में टीएमसी की बीजेपी पर बढ़त पर नजर डालते हैं, उत्तरी सीमावर्ती इलाकों में उसे 21 फीसदी की विशाल बढ़त है, जबकि, डेल्टा क्षेत्र में 13 फीसदी की बढ़त, लेकिन, यह उत्तर की पहाड़ी आते-आते गिरकर 5 फीसदी हो जाती है और दक्षिण के मैदान में यह बढ़त मामूली 2 फीसदी की रह जाती है. पहाड़ों में स्थिति पहले ही उलट चुकी है और टीएमसी बीजेपी से 3 फीसदी पीछे है. आपका अंदाजा सही है. यह वही इलाका है जहां झारग्राम और पुरुलिया जैसे जिले हैं. यहां टीएमसी वोटों के लिए बीजेपी पर माओवादियों से हाथ मिलाने का आरोप लगा रही है.
इन इलाकों में वाम मोर्चे से बीजेपी की ओर महज दो फीसदी वोटों का हस्तांतरण भी परिस्थिति बदल दे सकता है. अगर ऐसा नहीं होता है, तो टीएमसी की ओर और अधिक मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण होगा, जिससे ये अंतर बढ़ेगा और, उसका मतलब इस बड़े राज्य के पूर्वी क्षेत्र में बीजेपी के लिए महज 4 से पांच सीट ही निकलता दिखता है.
संभावनाओं पर बात करें तो ममता बनर्जी इसी वोट शेयर के साथ इस मुकाबले का अंत 42-0 से शानदार तरीके से कर सकती हैं. अगर यह खबर सही है कि माल्दा से कांग्रेस की सांसद मौसम नूर टीएमसी में शामिल हो रही हैं तो यह पश्चिम बंगाल कांग्रेस इकाई की ताबूत में आखिरी कील होगी. वह कांग्रेस के बड़े नेता एबीए गनी खान चौधरी की बेटी हैं. कांग्रेस को उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्र में मिल रहे 15 फीसदी वोट का ज्यादातर हिस्सा इसी माल्दा का है.
इस क्षेत्र में टीएमसी को पहले ही बीजेपी से करीब 20 फीसदी वोट अधिक मिलता दिखाया गया है. कांग्रेस की इकलौती सांसद इसी क्षेत्र से आती हैं. अगर मौसम नूर टीएमसी मे जाती हैं तो यहां टीएमसी के लिए ट्रैफिक एकतरफा हो जाएगा.
हमारे डाटा बताते हैं कि इस क्षेत्र में टीएमसी 8 सीटों में से 7 पर बढ़त पर है और मौसम नूर के पार्टी में आ जाने के बाद यह आंकड़ा 8-0 हो जाएगा. टीएमसी को इस क्षेत्र में 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिलते दिख रहे हैं.
अगर टीएमसी नेतृत्व सोचता है कि बीजेपी पर उनकी 10 फीसदी बढ़त पूरे राज्य में समान रूप से है, तो ऐसा नहीं है. उन्हें तगड़ा सदमा लग सकता है. यह सदमा महज एक प्रतिशत की बढ़त से दक्षिण के मैदानी इलाकों और 2.5 फीसदी की बढ़त से उत्तर की पहाड़ियों में लग सकता है. इस समय टीएमसी के लिए जो 32 सीटें दिखायी गयी हैं उनमें से 18 इन्हीं दो क्षेत्र से आ रही हैं.
अन्यथा अभी मेरा आकलन है कि बीजेपी को पूर्वी क्षेत्र में 24 सीटों का फायदा हो रहा है जो यादव के अनुमान ‘20 से ज्यादा’ के मुकाबले कमोबेश एक जैसा है कि भगवा पार्टी को फायदा हो रहा है.
(लेखक सी-वोटर इंटरनेशनल के संस्थापक डायरेक्टर हैं। उनका ट्विटर हैंडल है @YRDeshmukh. व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। द क्विन्ट न इसकी वकालत करता है और न ही इसके लिए जिम्मेदार है।)
Published: 24 Nov 2018,12:55 PM IST