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संभल: ‘मेरे बेटे को 3 गोली लगी..' अदालत का आदेश फिर भी पुलिस पर FIR क्यों नहीं?

संभल में मस्जिद के सर्वे के दौरान हुए हिंसा में घायल युवक के पिता ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं.

Shadab Moizee
न्यूज
Published:
<div class="paragraphs"><p>साल 2024 के नवंबर में संभल में मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा भड़क उठी थी.</p></div>
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साल 2024 के नवंबर में संभल में मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा भड़क उठी थी.

(फोटो- द क्विंट)

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"24 नवंबर 2024 को आलम संभल के जामा मस्जिद, मोहल्ला कोट के पास अपने ठेले पर पापे-बिस्कुट बेचने पहुंचा तो वहां पहले से भीड़ जमा थी, तभी पुलिस क्षेत्राधिकारी (CO) संभल अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज कुमार तोमर और 15-20 अन्य पुलिसकर्मियों ने जान से मारने की नीयत से भीड़ पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं, जान बचाने के लिए भागते समय आलम को पुलिस की गोलियां लगीं— दो गोलियां पीठ में और एक हाथ में लगी, जिससे वह गिर गया. मौके पर मौजूद कुछ लोग आलम को गंभीर अवस्था में घर लेकर आए. घायल आलम को संभल में कई डॉक्टरों के पास व अस्पताल में उसे लेकर गया लेकिन किसी ने भी उसका इलाज नहीं किया."

ये आरोप साल 2024 के नंवबर में संभल में मस्जिद के सर्वे के दौरान हुए हिंसा में घायल युवक आलम के पिता ने लगाए हैं.

घायल युवक के पिता का आरोप है कि 2024 में पुलिस प्रशासन के डर से संभल, मुरादाबाद और अलीगढ़ के अस्पतालों ने उनके घायल बेटे को भर्ती करने से मना कर दिया. आखिर में उन्होंने पहचान छिपाकर मेरठ के एक अस्पताल में बेटे का ऑपरेशन करवाया, जहां उसके शरीर से गोली निकाली गई.

अब इस पूरे मामले में नया मोड़ आया है. आलम के पिता ने 4 फरवरी 2025 को एक याचिका दायर की थी. इस याचिका पर एक दर्जन से ज्यादा बार सुनवाई के बाद चंदौसी स्थित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) विभांशु सुधीर ने तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी और इंस्पेक्टर अनुज तोमर समेत 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया है.

9 जनवरी को अपने आदेश में जज ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट (जिसमें 'गन शॉट वाउंड' और हड्डी टूटने का जिक्र है) और पीड़ित के बयान से यह स्पष्ट होता है कि एक संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) घटित हुआ है.

संभल पुलिस ने क्या कहा?

इस मामले पर संभल पुलिस ने कहा है कि न्यायालय द्वारा दिये गए आदेश के विरुद्ध सक्षम न्यायालय में अपील की जाएगी. इस मामले पर क्विंट ने संभल के पुलिस अधीक्षक (एसपी) कृष्ण कुमार बिश्नोई से भी बात करने की कोशिश की लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका. वहीं टाइम्स ऑफ इंडिया में एसपी बिश्नोई के हवाले से लिखा है संभल हिंसा को लेकर पहले ही एक न्यायिक जांच पूरी हो चुकी है.

संभल पुलिस का बयान

फोटो - https://x.com/sambhalpolice/status)

गोली लगने के आरोप पर सीजेएम के ऑर्डर में पुलिस का जवाब भी दर्ज है. पुलिस ने तर्क दिया था कि बरामद गोली 32 बोर की है जो पुलिस इस्तेमाल नहीं करती.

अदालत के फैसले में पुलिस का बयान

(फोटो- क्विंट हिंदी)

हालांकि जज ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (ओम प्रकाश यादव बनाम निरंजन कुमार और देविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य) का हवाला देते हुए कहा है कि लोक सेवक (Public Servant) पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार की मंजूरी तभी चाहिए जब कार्य "सरकारी कर्तव्य" के निर्वहन में किया गया हो. और ऐसे गैर-कानूनी कृत्यों के लिए पुलिस को कोई सुरक्षा (immunity) नहीं मिल सकती.

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अदालत ने धारा 173(4) BNSS के तहत आवेदन स्वीकार करते हुए थाना प्रभारी (SHO) संभल को आदेश दिया कि वे तुरंत मामला दर्ज करें और नियमानुसार विवेचना सुनिश्चित करें, कोर्ट ने पंजीकरण की सूचना 7 दिनों के भीतर देने का निर्देश भी दिया है. मतलब पुलिस को मुकदमा (FIR) दर्ज करना होगा और कोर्ट को एक हफ्ते के अंदर यह लिखित जानकारी देनी होगी कि उन्होंने कोर्ट के आदेशानुसार केस दर्ज कर लिया है.

द क्विंट ने इस मामले में याचिका देने वाले के वकील कमर आलम से भी बात की. कमर बताते हैं, हमें एफआईआर दर्ज कराने के लिए अदालत का रास्ता देखना पड़ा. एफआईआर दर्ज करने का यह आदेश एक लंबी लड़ाई के बाद आया है."

क्या पुलिस अदालत के आदेश के बाद भी ٖFIR नहीं दर्ज कर सकती है?

इस सवाल के जवाब में वकील कमर आलम कहते हैं, ‘यह एक इंटरलोक्यूटरी ऑर्डर है (प्रारंभिक निषेधाज्ञा या अस्थायी निरोधक आदेश), इस मामले में कोर्ट ने एफआईआर दर्ज कर जांच के आदेश दिए हैं. यह मामले में अंतिम फैसला नहीं है. पुलिस को मामला दर्ज करना होगा. और अगर ऐसा नहीं होता है तो ये अदालत की अवमानना माना जाएगा."

कमर आलम आगे बताते हैं कि 4 फरवरी 2025 को जब पीड़ित आलम के पिता की ओर से याचिका दायर की गई थी तब इसके बाद पुलिस ने पीड़ित को संभल हिंसा से जुड़े एक मामले में आरोपी के तौर पर नामजद किया, अभियुक्त बनाया.

सीजेएम के फैसले में भी पुलिस के हवाले से लिखा है कि आवेदक का पुत्र पर धारा 191(2), 190,191(3),115(2), 352, 221,132,121(1), 121(2), 109(1), 125, 223ख, के तहत मामला दर्ज है. और वो वांछित चल रहा है.

संभल हिंसा की वजह क्या है?

संभल की शाही जामा मस्जिद को लेकर विवाद है. हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही जामा मस्जिद ‘हरिहर मंदिर को तोड़कर बनाया’ गया था. संभल के केला देवी मंदिर के महंत ऋषिराज गिरि और पांच अन्य ने चंदौसी कोर्ट में याचिका लगाई थी और कहा था कि 1529 में मुगल शासक बाबर ने ‘हरिहर मंदिर’ को तोड़कर मस्जिद बनाया था.

इसी मामले पर 19 नवंबर 2024 को चंदौसी कोर्ट में याचिका दायर की गई और इसी दिन अदालत ने सर्वे की इजाजत भी दे दी और इसी तारीख को सर्वे के लिए टीम भी आ गई. कोर्ट ने मस्जिद के सर्वे के लिए एडवोकेट कमिश्नर रमेश सिंह राघव को नियुक्त किया था.

चंदौसी कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद ही एडवोकेट कमिश्नर रमेश ने सर्वेक्षण के लिए संभल के जिलाधिकारी राजेंद्र पेंसिया से इजाजत ली और और फिर रात होते होते सर्वेक्षण करने एक टीम मस्जिद पहुंच गई. हालांकि उस दिन सर्वेक्षण के दौरान या बाद में किसी तरह की कोई हिंसा या विरोध प्रदर्शन देखने को नहीं मिला.

लेकिन 24 नवंबर को दोबारा सर्वे के लिए टीम पहुंची. इसी बीच सर्वेक्षण के विरोध में लोग विरोध प्रदर्शन करने लगे, इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें 5 लोगों की मौत हुई. जिसके बाद पुलिस ने करीब 12 एफआईआर दर्ज किए और 100 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया.

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