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मेरे प्यारे भारत!
सुना है आजकल तू कुछ बीमार सा हो गया है. तेरे ही शरीर के कुछ अंग अब अपने आप को ज्यादा महत्वपूर्ण बताने में लगे हैं और तो और वो ये भी दावा कर रहे हैं कि वे दूसरों का काम भी खुद ही कर लेंगे. जैसे अंगुलियां चार हैं तो अंगूठे की क्या जरूरत अब या इसकी हाथ में क्या अहमियत. सुना तो बुरा लगा कि माना कि अंगुलियां चार हैं और अंगूठा एक, पर अंगूठे के बिना वो हाथ हाथ नहीं रह जाता. और ये भी सुना है कि जीभ ने स्वाद बताना शुरू किया और बताया कि नमक ज्यादा है तो दांतों ने उसे ही काट लिया अपने ही घर में.
सुनकर ताजुब्ब होता है कि कहां एक वो शरीर (भारत) था जहां सब अंग एक-दूसरे पर जान न्यौछावर करते थे, एक-दूसरे को भाई मानते थे और अब उन्हीं भाईयों को अपना डीएनए करवाना होगा कि तुम सब एक ही शरीर के अंग हो. अब उन्हें खुद को साबित करना होगा कि आंखों ने जो देखा वो सही देखा, कानों ने जो सुना सही सुना, जीभ ने जो स्वाद बताया वो सही था??
और हर बार खून को क्यूं जांच रहे हो कि लाल है की नहीं, भाई खून तुम सब में से ही तो बहता रहता है पूरे दिन. हर बार खून ही क्यों साबित करे की वह शुद्ध है, लाल है, विषाक्त रहित है, प्रति जैविक है, रोग निवारक है. कभी आंत भी जवाब दे कि जठ्ठर रस शरीर में (संसद में नए बिल हो या देश में उपद्रव) कौन ला रहा है?
कभी नाक से भी पूछो की ऑक्सीजन के साथ SO2, CO2, CO को अंदर आने की अनुमति कौन देता है?? हमेशा कांख(दलितों) को ही हेय की दृष्टि से देखते हो कि गन्दा है, बदबूदार है; कभी सोचा है कि ये शरीर की गंदगी साफ करके खुद बदनाम होते हैं, पर अगर ये नहीं होते तो पूरा शरीर अनेकों बीमारियों से ग्रसित होता.
पर मैं ये भी जानता हूं कि कोई अंग अपना काम नहीं छोड़े, दांतों को ललकार के भी जीभ स्वाद बताये, पांव पूरे शरीर को ढोकर भी ना डगमगाएं, नाक से कितनी भी प्रदूषित वायु क्यूं न अंदर आ जाए फेफड़े उसे साफ करते रहे. ये भारत है ऐसे ही टूट नहीं जाएगा. शीघ्र स्वस्थ होने के लिए कामना और दीर्घायुष्मान भव:.
रावण आज़ाद, जोधपुर राजस्थान
इस गणतंत्र दिवस, क्विंट हिंदी अपना कैंपेन 'लेटर टू इंडिया' वापस लेकर आया है. इस गणतंत्र दिवस, 'हिंदुस्तान' के नाम अपने एहसासों को शब्दों के सहारे बताइए.
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे...