Home Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Hindi Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019News Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019केरल सीरियल ब्लास्ट: कौन हैं 'यहोवा के साक्षी' और क्या हैं उनकी मान्यताएं?

केरल सीरियल ब्लास्ट: कौन हैं 'यहोवा के साक्षी' और क्या हैं उनकी मान्यताएं?

Kerala Serial Blasts: डोमिनिक मार्टिन ने केरल हमले की जिम्मेदारी ली और अब पुलिस उससे पूछताछ कर रही है.

मैथ्यू श्माल्ज़
न्यूज
Published:
<div class="paragraphs"><p>केरल सीरियल ब्लास्ट: कौन हैं 'यहोवा के साक्षी' और क्या हैं उनकी मान्यताएं?</p></div>
i

केरल सीरियल ब्लास्ट: कौन हैं 'यहोवा के साक्षी' और क्या हैं उनकी मान्यताएं?

(फोटो: क्विंट हिंदी)

advertisement

केरल (Kerala) के कोची में ईसाई संप्रदाय 'यहोवा के साक्षियों' की प्रार्थना सभा के दौरान रविवार, 29 अक्टूबर को हुए सीरियल ब्लास्ट में 3 लोगों की मौत हो गई और कम से कम 50 लोग घायल हो गए.

इसी समूह के एक पुराने सदस्य डोमिनिक मार्टिन ने इस हमले की जिम्मेदारी ली और अब पुलिस उससे पूछताछ कर रही है, तो कौन होते हैं 'यहोवा के साक्षी' और उनकी क्या मान्यताएं हैं?

ये लेख मूल रूप से द कन्वर्सेशन ने प्रकाशित किया था. लेखक मैथ्यू श्माल्ज वॉर्सेस्टर, मैसाचुसेट्स में होली क्रॉस कॉलेज में धार्मिक अध्ययन के प्रोफेसर हैं.

1. शुरुआती इतिहास

'यहोवा के साक्षियों' की कहानी 19वीं सदी के आखिर में पेंसिलवेनिया के पिट्सबर्ग में कुछ छात्रों के बाइबल पढ़ने के साथ शुरू होती है. इस ग्रुप का नेतृत्व प्रेस्बिटेरियन पृष्ठभूमि के एक धार्मिक व्यक्ति चार्ल्स टेज रसेल कर रहे थे. इन विद्यार्थियों ने "यहोवा" को हिब्रू भाषा के "याह्वेह" समझा जो स्वयं परमपिता परमेश्वर का नाम है.

रसेल और उनके साथियों ने यीशु मसीह से उम्मीद जताई कि वे धरती पर "सहस्राब्दी" या एक हजार साल की शांति स्थापित करेंगे. माना गया कि इस "स्वर्ण युग" में धरती पर बुराईयां नहीं होंगी, एक "धर्मी" सामाजिक व्यवस्था होगी जिसमें गरीबी या असमानता के लिए कोई स्थान नहीं होगा.

1916 में रसेल की मौत हो गई, लेकिन उनका ये ग्रुप कायम रहा और बढ़ता गया. "यहोवा के साक्षी" नाम को औपचारिक रूप से 1930 के दशक में अपनाया गया था.

2. क्या हैं उनकी मान्यताएं?

यहोवा के साक्षी त्रिएकत्व के विचार मान्यता नहीं रखते. ज्यादातर ईसाइयों के लिए, ईश्वर तीन व्यक्तियों का मिलन है- पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा.

इसके बजाय, यहोवा के साक्षियों का मानना ​​है कि यीशु ईश्वर से अलग हैं- उनके साथ एक व्यक्ति के रूप में नहीं जुड़े हैं. उनके लिए "पवित्र आत्मा" का मतलब ईश्वर की शक्ति से है. ऐसे सिद्धांत जो मानते हैं कि ईश्वर प्रकृति में "त्रिएक" हैं, यहोवा के साक्षियों को मुख्य ईसाई संप्रदायों से अलग करते हैं.

लेकिन अन्य ईसाई संप्रदायों की तरह, यहोवा के साक्षी भी पूजा और गीत के जरिए भगवान की स्तुति करते हैं. उनके जमा होने की जगह को "किंगडम हॉल" कहा जाता है. ये साधारण इमारतें होती हैं- छोटे सम्मेलन केंद्रों की तरह, जो आसानी से बनाई जा सकती हैं. अंदर इसमें लाइन से कुर्सियां लगी होती हैं और वक्ता के लिए एक मंच होता है, लेकिन इसकी सजावट थोड़ी खास होती है. यहोवा के साक्षी बाइबल पढ़ने और घर-घर जाकर प्रचार करने में पर्याप्त समय देने के लिए जाने जाते हैं.

उनकी बाइबिल व्याख्याओं और मिशनरी कामों के निश्चित रूप से आलोचक हैं, लेकिन राजनीतिक तटस्थता के चलते ये सबसे ज्यादा शक की निगाह से देखे जाते हैं.

यहोवा के साक्षी कई मामलों में सरकार के वैध अधिकार को स्वीकार करते हैं. उदाहरण के लिए, वे मरकुस 12:17 में (सीजर को वही प्रदान करें जो सीजर का है) यीशु की चेतावनी का पालन करते हुए करों का भुगतान करते हैं.

लेकिन वे चुनाव में वोट नहीं देते, सेना में सेवा नहीं करते या झंडे को सलामी नहीं देते. उनका मानना ​​है कि ऐसे काम ईश्वर के प्रति उनकी प्राथमिक निष्ठा से समझौता करते हैं.

ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT

3. उत्पीड़न का इतिहास

यहोवा के साक्षियों की राजनीतिक भागीदारी नहीं होती, और वे हिंसा में भी भरोसा नहीं रखते. हालांकि, सरकारी प्रतीकों के सामने झुकने से इनकार करते हैं, इसलिए सरकार उन्हें आमतौर पर निशाने पर ले लेती है. कई राष्ट्रवादी उन्हें "राज्य के दुश्मन" कहते हैं. इसी के चलते उनका इतिहास में दुनिया के कई हिस्सों में उत्पीड़न से भरा रहा है.

दोनों विश्व युद्धों के दौरान अमेरिका में यहोवा के साक्षियों को सेना में सेवा देने से इनकार पर जेल में डाल दिया गया था. 1940 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में, स्कूल डिस्ट्रिक्ट्स को उन यहोवा के साक्षियों को निष्कासित करने की अनुमति दी गई जिन्होंने अमेरिकी ध्वज को सलामी देने से इनकार कर दिया था.

1940 और 1950 के दशक में यहोवा के साक्षियों ने अमेरिका और यूरोप दोनों में धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता के लिए कानूनी लड़ाइयां लड़ीं.

नाजी जर्मनी में, यहोवा के साक्षियों को यातना शिविर में मार दिया गया. नाजियों ने उन्हें पहचानने के लिए एक बैंगनी त्रिकोण का उपयोग किया था. 1960 और 1970 के दशक में, तानाशाह हेस्टिंग्स बांदा का समर्थन करने से इनकार करने पर मलावी कांग्रेस पार्टी के यूथ लीग के सदस्यों ने दर्जनों अफ्रीकी यहोवा के साक्षियों की हत्या कर दी थी. कई लोग उस वक्त पड़ोस के मोजाम्बिक भाग गए, जहां उन्हें नजरबंदी शिविरों में रखा गया.

4. 'पंथ' का तमगा

जर्मनी में पुलिस ने कहा है कि 2023 की गोलीबारी शायद एक अकेले व्यक्ति का ही काम था, जिसने संगठन को "अच्छी शर्तों पर" नहीं छोड़ा था. हालांकि, इसके पीछे क्या मकसद था, इसके बारे में उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी.

कभी-कभी, इसके सदस्यों और पूर्व सदस्यों के बीच ब्लड ट्रांसफ्यूजन से इनकार करने जैसे मुद्दों को लेकर विवाद भी सामने आते हैं. इसके अलावा ये समूह जिन चीजों को पाप मानता है, उन्हें करने के बाद पश्चाताप न करने वाले व्यक्ति का बहिष्कार करने जैसी प्रथाओं की आलोचना भी होती है.

लोकप्रिय संस्कृति में, यहोवा के साक्षियों को कभी-कभी एक "पंथ" के सदस्यों के रूप में देखा जाता है. इसके चलते वे आसानी से उत्पीड़न और हिंसा के शिकार हो जाते हैं.

हालांकि, जैसा कि मैंने और अन्य धर्म विद्वानों ने लिखा है, इस शब्द को परिभाषित करना बहुत कठिन है- और सूक्ष्म समझ के बजाय रूढ़िवादिता की ओर ले जाता है.

(क्विंट हिंदी में, हम केवल अपने दर्शकों के प्रति जवाबदेह हैं. सदस्य बनकर हमारी पत्रकारिता को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभाएं. क्योंकि सच्चाई को आपका सहयोग चाहिए.)

Published: undefined

ADVERTISEMENT
SCROLL FOR NEXT