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करीब पांच दशकों तक चार हिंदुजा भाइयों (Hinduja brothers)- श्रीचंद, गोपीचंद, प्रकाश और अशोक ने दुनिया के सामने “हिंदुजा ग्रुप्स” का संयुक्त मोर्चा पेश किया. हिंदुजा समूह के स्वामित्व, जिसमें वे संयुक्त रूप से 15 बिलियन डॉलर से की संपत्ति के मालिक हैं, के बारे में उनका सिद्धांत रहा कि "सब कुछ सभी का है और कुछ भी किसी का नहीं है."
आइए जानते हैं क्या है “हिंदुजा ग्रुप्स” का इतिहास, हिंदुजा ब्रदर्स के पास कितनी संपत्ति है क्यों उभरा है विवाद और पहले के फैसले क्या हैं.
ब्रिटिश भारत के सिंध क्षेत्र में 1914 में उनके पिता परमानंद दीपचंद हिंदुजा द्वारा स्थापित “हिंदुजा ग्रुप्स” शुरुआत में केवल कमोडिटी-ट्रेडिंग फर्म थी लेकिन चारों भाइयों ने इसे तेजी से विविधता प्रदान की और इस कंपनी को भारत के बाहर बॉलीवुड फिल्मों को वितरित करने से शुरुआती सफलता मिली.
1984 में हिंदूजा ग्रुप ने गल्फ ऑयल इंटरनेशनल को खरीदा जबकि 1987 में हिंदूजा ग्रुप में अशोक लेलैंड में पहला स्टेक खरीदा था. अशोक लेलैंड आज दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी बस बनाने वाली कंपनी है.
“हिंदुजा ग्रुप्स” के तेज ग्रोथ से चारों भाई पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश और ब्रिटेन के प्रधान मंत्री बोरिस जॉनसन तक के करीबी हो गए. लंदन में वे क्वीन एलिजाबेथ के पड़ोसी हैं. श्रीचंद हिंदुजा और गोपीचंद हिंदुजा ब्रिटेन के नागरिक तथा ब्रिटेन के सबसे धनी व्यक्तियों में से हैं.
हिंदुजा समूह का कारोबार करीब 40 देशों में फैला है. यह ऑटो, वित्तीय सेवाओं, आईटी, मीडिया, इन्फ्रास्ट्रक्चर, एनर्जी और केमिकल और हेल्थ सेवा क्षेत्रों से जुड़ा है. भारत का दूसरा बड़ा ट्रक ब्रांड अशोका लीलैंड इसी हिंदुजा ग्रुप का है. इंडसइंड बैंक में भी इनकी 14% से ज्यादा की हिस्सेदारी है.
फोर्ब्स के अनुसार रियल टाइम में हिंदुजा ब्रदर्स की कुल संपत्ति 14.2 बिलियन डॉलर्स की है. भाइयों के पास लंदन में मूल्यवान अचल संपत्ति है, जिसमें व्हाइटहॉल में ऐतिहासिक ओल्ड वॉर ऑफिस भवन भी शामिल है, जिसमें रैफल्स होटल है. श्रीचंद और गोपीचंद लंदन में रहते हैं और प्रकाश मोनाको में रहते हैं जबकि सबसे छोटे भाई अशोक मुंबई से उनके भारतीय हितों की देखरेख करते हैं.
2 जुलाई 2014 को चारों भाइयों ने कथित तौर पर एक समझौते पर हस्ताक्षर किया जिसमें कहा गया है कि एक भाई की संपत्ति सभी की है और प्रत्येक भाई दूसरों को अपने एग्जीक्यूटिव के रूप में नियुक्त करेगा. इसी को हिंदुजा परिवार का "सब कुछ सभी का है और कुछ भी किसी का नहीं है." सिद्धांत कहा जाता है. लेकिन पिछले साल यूके कोर्ट के फैसले के बाद संपत्ति पर भाइयों बीच की लड़ाई सार्वजनिक हो चुकी है.
समझौते पत्र पर यूके और स्विट्जरलैंड कोर्ट का अंतिम फैसला आना बाकी है.
श्रीचंद हिंदुजा और उनकी बेटी वीनू ने यह कहते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया कि समझौते वाले पत्र का कोई कानूनी प्रभाव नहीं होना चाहिए और इसे वसीयत या पावर ऑफ अटॉर्नी के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. श्रीचंद हिंदुजा चाहते थे कि लेटर को बेकार घोषित किया जाए.
कोर्ट ने कहा कि श्रीचंद हिंदुजा ने 2015 में जोर देकर कहा था कि पत्र "उनकी इच्छाओं को नहीं दर्शाता है और परिवार की संपत्ति को अलग कर दिया जाना चाहिए". जबकि श्रीचंद के तीनों छोटे भाइयों ने कहा कि श्रीचंद एक प्रकार के डेमेंशिया से पीड़ित थे और उनका स्वास्थ्य कई वर्षों से बिगड़ रहा है.
श्रीचंद चाहते हैं कि लंदन की अदालत यह फैसला दे कि पत्र का कोई "कानूनी प्रभाव" नहीं है. उस पर निर्णय आने पर अभी कुछ समय है, लेकिन यदि वह सफल होता है, तो उसके नाम की संपत्ति उसकी बेटियों वीनू और शानू को उसकी मृत्यु पर दी जा सकती है. इस बीच स्विट्ज़रलैंड की एक अदालत ने कहा है कि श्रीचंद और उनके भाइयों के बीच का मामला लंबित है क्योकि इस पर एक दूसरा निर्णय लंबित है कि उनके हितों का प्रतिनिधित्व कौन करेगा.