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UP: पूर्वांचल में अनियमित बारिश, 7 साल के आंकड़े बता रहे कैसे बदल रही खेती

आजमगढ़ में 7 साल की बारिश के आंकड़े बताते हैं कि बदलते मानसून के साथ किसानों का क्रॉपिंग पैटर्न भी बदल रहा है.

आकाश कुमार
न्यूज
Published:
<div class="paragraphs"><p>How Climate Change is Reshaping Farming in Azamgarh, Uttar Pradesh</p></div>
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How Climate Change is Reshaping Farming in Azamgarh, Uttar Pradesh

Photo: The Quint

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उत्तर प्रदेश में मॉनसून 12 दिन देरी से 30 जून को पहुंचा. राज्य में बारिश की 40% कमी बनी हुई है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक, यह कमी पूर्वी उत्तर प्रदेश में ज्यादा है. यहां बारिश में 50% की कमी है, जबकि पश्चिमी यूपी की स्थिति थोड़ी बेहतर है. यानी हर साल की तरह इस साल भी पूर्वांचल के किसान बारिश की अनियमितता से परेशान हैं. IMD के पिछले 7 सालों (2019-2025) के आंकड़े बताते हैं कि कुशीनगर, देवरिया, जौनपुर, चंदौली, मऊ और आजमगढ़ में साल दर साल बारिश की भारी कमी दर्ज की गई. ऐसे में आजमगढ़ के जरिए समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे अनियमित बारिश खेती का नक्शा बदल रही है. बारिश की वजह से क्रॉपिंग पैटर्न में बदलाव हो रहे हैं.  किसान धीरे-धीरे ज्यादा पानी वाली फसलों से दूरी बना रहे हैं. कम पानी वाली फसलें नया विकल्प बन रही हैं. 

आजमगढ़ में 2019 से 2025 तक बारिश का पैटर्न: कब बरसे बादल, कब पड़ा सूखा?

पिछले 7 सालों के मौसम विभाग (IMD) के आंकड़े स्पष्ट रूप से आजमगढ़ में मानसूनी बारिश में भारी गिरावट का संकेत देते हैं. जिले में साल 2025 में तो बारिश सामान्य से बहुत कम हुई. 

साल 2019 से 2021 (सामान्य बारिश के साल): साल 2019 में जिले में 860.3 मिमी मानसूनी बारिश दर्ज की गई, जो खेती के लिए काफी अच्छी थी. इसके बाद 2020 में 837.3 मिमी और 2021 में 819.3 मिमी बारिश हुई, जिससे इन सालों में जल संकट की स्थिति नहीं बनी.

साल 2022 और 2023 (सूखे की शुरुआत): साल 2022 में बारिश का ग्राफ अचानक गिरकर 557.1 मिमी पर आ गया. साल 2023 में हालात और खराब हो गए और पूरे सीजन में मात्र 415 मिमी पानी ही बरसा, जिसने सूखे की स्थिति पैदा कर दी.
 
2024 (हल्की राहत): 2024 में मानसून कुछ मेहरबान हुआ और 786.3 मिमी बारिश दर्ज की गई, जिससे किसानों को थोड़ी राहत मिली.
 
2025 (फिर से सूखा): साल 2025 किसानों के लिए बड़ा झटका साबित हुआ. इस साल सामान्य बारिश (854.3 मिमी) के मुकाबले सिर्फ 503.5 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से 41% कम (Deficient) दर्ज की गई.

7 सालों के आंकड़े बताते हैं कि आजमगढ़ में मानसून अब लगातार अस्थिर होता जा रहा है. 2022 के बाद बारिश में आई भारी गिरावट और 2025 में 41% वर्षा की कमी इस बात का संकेत है कि जिले में सूखे का जोखिम बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर किसानों और क्रॉपिंग पैटर्न पर पड़ रहा है.

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खरीफ की फसलों पर बुरा असर

पिछले 7 सालों (2019-2025) में आजमगढ़ में खरीफ सीजन की फसलों के आच्छादन और उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ा है. साल 2019 में खरीफ का कुल आच्छादन 2,29,089 हेक्टेयर और उत्पादन 5,58,858 मीट्रिक टन था. 2023 तक यह बढ़कर 2,34,618 हेक्टेयर (उत्पादन 6,29,525 मीट्रिक टन) तक पहुंचा, लेकिन 2025 के सूखे ने पूरी तस्वीर बदल दी और आच्छादन बुरी तरह सिकुड़कर मात्र 1,67,618 हेक्टेयर तथा उत्पादन 4,76,030 मीट्रिक टन पर आ गया.

खरीफ के ठीक विपरीत, रबी सीजन (2019-20 से 2025-26) में किसानों ने अपनी रणनीति बदलते हुए आच्छादन और उत्पादन दोनों में निरंतर और शानदार वृद्धि दर्ज की है. साल 2019-20 में रबी का कुल क्षेत्रफल 2,47,058 हेक्टेयर और उत्पादन 8,26,502 मीट्रिक टन था, जो 7 सालों में लगातार बढ़कर 2025-26 में 2,73,634 हेक्टेयर क्षेत्रफल और 10,68,781 मीट्रिक टन के रिकॉर्ड उत्पादन स्तर तक पहुंच गया.

कम सिंचाई वाली नकदी फसल 'राई-सरसों' ने पूरे रबी पैटर्न को बदल दिया. 2019-20 में जहां यह सिर्फ 2,278 हेक्टेयर में बोई जाती थी, 2025-26 आते-आते इसका रकबा बढ़कर 31,852 हेक्टेयर हो गया.

पानी की कमी से क्रॉपिंग पैटर्न में बदलाव?

आजमगढ़ में मानसूनी बारिश के घटते और अस्थिर पैटर्न (2019 में 860.3 मिमी से गिरकर 2025 में 503.5 मिमी) ने किसानों को अपनी खेती के तरीकों में बदलाव करने पर मजबूर कर दिया है. पानी की कमी के कारण किसान अधिक पानी मांगने वाली पारंपरिक फसलों को छोड़कर कम पानी में तैयार होने वाली नकदी और मोटे अनाजों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं, जिन्हें इन 5 उदाहरणों से समझा जा सकता है.

1. धान (Paddy): बारिश की अनियमितता का सीधा और नकारात्मक असर धान पर पड़ा है. 2019 (2,17,049 हेक्टेयर) से लेकर 2024 (2,10,154 हेक्टेयर) तक किसानों ने धान की बुवाई को स्थिर रखने की कोशिश की. लेकिन 2025 में बारिश की कमी के कारण धान का रकबा अत्यधिक सिकुड़कर मात्र 1,50,286 हेक्टेयर रह गया. अगर इसकी तुलना 2019 से करें तो 7 साल में  30.76% की भारी कमी हुई.

धान के उत्पादन की बात करें तो 2019 के 5,38,004 मीट्रिक टन उत्पादन था लेकिन 2025 में 4,28,604 मीट्रिक टन रह गया. यह उत्पादन में 20.33% की कमी दर्शाता है. अगर 2023 के 5,92,899 मीट्रिक टन उत्पादन से तुलना करें, तो यह गिरावट 27.71% रही.

2. दलहनी फसलों (अरहर और उड़द) के आच्छादन में भारी गिरावट: मानसून की अत्यधिक अनिश्चितता का प्रतिकूल प्रभाव दलहनी फसलों पर भी स्पष्ट रूप से पड़ा है. 2024 में अरहर का आच्छादन 11,393 हेक्टेयर था, जो 2025 में जल संकट के कारण घटकर आधे से भी कम मात्र 5,343 हेक्टेयर रह गया. इसी तरह, उड़द की खेती 2024 के 294 हेक्टेयर से सिमटकर 2025 में केवल 68 हेक्टेयर रह गई.

3. मक्का (Maize): कम पानी में अच्छे मुनाफे का नया विकल्प: बारिश की कमी के बीच मक्का एक सबसे सुरक्षित विकल्प बनकर उभरा है. 2019 में मक्के का क्षेत्रफल मात्र 112 हेक्टेयर था. बारिश की मात्रा में गिरावट के साथ इसका रकबा लगातार बढ़ता गया और 2025 में यह ऐतिहासिक रूप से बढ़कर 9,762 हेक्टेयर हो गया.  रकबे के साथ-साथ उत्पादन में लगभग 153 गुना बढ़ोतरी हुई, जो नए क्रॉपिंग पैटर्न की सफलता को दिखाती है.
 
4. रबी सीजन में राई-सरसों (Mustard) की खेती की ओर झुकाव: खरीफ सीजन में मानसून की अनिश्चितता से हुए नुकसान को संतुलित करने के लिए किसानों ने रबी सीजन में कम सिंचाई वाली नकदी फसल 'सरसों' की खेती को प्राथमिकता दी है. 2019-20 में सरसों का रकबा केवल 2,278 हेक्टेयर था, जो 2022-23 (वर्षा में पहली बड़ी कमी के बाद) से तेजी से बढ़ा और 2025-26 तक 31,852 हेक्टेयर के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया.

5. गेहूं (Wheat): आजमगढ़ में 2019-20 से 2025-26 के बीच गेहूं की खेती के पैटर्न में रकबा घटने के बावजूद उत्पादन में शानदार वृद्धि का रुझान देखने को मिला है. 2019-20 में गेहूं 2,32,369 हेक्टेयर में बोया गया था. 2025-26 में इसका रकबा थोड़ा घटकर 2,25,724 हेक्टेयर रह गया. यह गेहूं के क्षेत्रफल में लगभग 2.86% की मामूली गिरावट दर्शाता है.

21.8% की जबरदस्त वृद्धि: रकबा कम होने के बावजूद, 2019-20 में जहां कुल उत्पादन 8,02,368 मीट्रिक टन था, वह 2025-26 में काफी बढ़कर 9,77,280 मीट्रिक टन हो गया. यह कुल उत्पादन में लगभग 21.8% की शानदार वृद्धि है.

25.4% का भारी उछाल: उत्पादन में हुई इस वृद्धि का मुख्य कारण गेहूं की उत्पादकता (प्रति हेक्टेयर उपज) में हुआ ऐतिहासिक सुधार है. 2019-20 में उत्पादकता 34.53 कुंतल/हेक्टेयर थी, जो 2025-26 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचकर 43.30 कुंतल/हेक्टेयर हो गई. उत्पादकता के लिहाज से यह लगभग 25.4% की भारी वृद्धि है.

2019-20 के मुकाबले 2025-26 में गेहूं की खेती का क्षेत्रफल 2.86% सिकुड़ गया, लेकिन प्रति हेक्टेयर पैदावार (उत्पादकता) में 25.4% का सुधार होने के कारण, जिले के कुल गेहूं उत्पादन में लगभग 21.8% का शुद्ध मुनाफा (वृद्धि) दर्ज किया गया.

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