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जून 2024 से फरवरी 2026 के बीच मस्जिदों के खिलाफ हुई 20 बड़ी कार्रवाइयों में से 11 मामले सीधे तौर पर PILs या शिकायतों के बाद शुरू हुए. APCR की रिपोर्ट बताती है कि अकेले 2025 में 69 इस्लामिक धार्मिक स्थलों को अवैध बताकर ढहा दिया गया.
यह ट्रेंड मीडिया और राजनीति में बढ़ते "लैंड जिहाद" के नैरेटिव के साथ मेल खाता है. अक्सर बिना पूरी जांच के ही 'बुलडोजर कार्रवाई' कर दी जाती है. फरवरी 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी एक NGO द्वारा लगातार धार्मिक स्थलों के खिलाफ दी जा रही शिकायतों पर चिंता जताई और इसे एक खतरनाक चलन बताया.
कानूनी जानकारों का कहना है कि अदालतों को ऐसी याचिकाओं पर सख्ती बरतनी चाहिए ताकि इनका इस्तेमाल राजनीतिक फायदे या किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए न हो सके. द क्विंट की इस खास रिपोर्ट में हम पड़ताल कर रहे हैं कि क्या ये मामले वाकई अतिक्रमण के खिलाफ हुई कार्रवाई के हैं, प्रशासनिक गड़बड़ियों से जुड़े हैं, या फिर एक सोचा-समझा राजनीतिक खेल बुना जा रहा है.
हालिया विवाद: दिल्ली की फैज-ए-इलाही मस्जिद : दिल्ली की फैज़-ए-इलाही मस्जिद के आसपास जनवरी 2026 में भारी पुलिस बल की मौजूदगी में 'सेव इंडिया फाउंडेशन' (SIF) की याचिका पर बुलडोजर कार्रवाई की गई.
प्रशासन ने दावा किया कि मस्जिद के पास की लगभग 39,000 वर्ग फुट भूमि, जिसमें कब्रिस्तान और कुछ व्यावसायिक निर्माण शामिल थे, अवैध अतिक्रमण का हिस्सा थी.
हालांकि, मस्जिद कमेटी का दावा है कि कब्रिस्तान वक्फ की जमीन पर बना है. प्रशासन पर ये भी आरोप है कि वक्फ के दस्तावेजों की जांच किए बिना ही प्रशासन ने एक्शन ले लिया.
2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद को लेकर अपना फैसला सुनाया, जिससे राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हुआ. एक ओर आरोप लगे कि फैसला जमीन विवाद की तरह न लेकर आस्था के आधार पर लिया गया, तो दूसरी ओर एक तबका ऐसा भी था, जिसका मानना था कि इससे देश में प्राचीन धार्मिक स्थलों को लेकर नए विवाद पनपने पर रोक लगेगी पर पिछले पांच सालों को देखें तो एक अलग ही तस्वीर नजर आती है.
नीचे इस्लाम धर्म से जुड़े उन स्थलों की लिस्ट है, जिनको लेकर 2024 से 2026 के बीच विवाद हुए.
इस सवाल का जवाब उन लोगों के बयानों में ही मिलता है, जो धार्मिक स्थलों का लेकर लगातार PIL दाखिल करने या शिकायत करने के मामले में सक्रिय हैं.
फैज-ए-इलाही मस्जिद को अवैध बताने वाले एक्टिविस्ट प्रीत सरोही न्यूज चैनल डिबेट के दौरान फैज- ए-इलाही दरगाह पर बात कर रहे हैं. इस दौरान वो ये आरोप लगाते हैं कि भारत की मस्जिदों का पैसा पाकिस्तान जा रहा है. खुद प्रीत सरोही का ही दावा है कि उन्होंने 2500 से ज्यादा मस्जिद या मजारों को अवैध साबित करने के लिए चिन्हित कर रखा है. प्रीत सरोही सेव इंडिया फाउंडेशन NGO के संस्थापक हैं. इसी NGO को लेकर दिल्ली HC ने टिप्पणी की थी.
प्रीत सरोही की इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर एक नजर डाली जाए तो दिखता है कि हर दूसरा पोस्ट किसी मस्जिद, कब्रिस्तान, मदरसे या दरगाह को लेकर है. सरोही के खिलाफ अलग-अलग थानों में नफरती बयान देने को लेकर FIR भी दर्ज हो चुकी हैं.
तुर्कमान गेट, दिल्ली: फैज़-ए-इलाही मस्जिद के पास प्रशासन की कार्रवाई के दौरान सोशल मीडिया पर लाइव आकर सांप्रदायिक तनाव भड़काने और भड़काऊ टिप्पणी करने के आरोप में.
सिविल लाइन्स, दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेशों का गलत अर्थ निकालकर समुदायों के बीच नफरत और वैमनस्य फैलाने (धारा 153A/295A) के आरोप में.
गौतम बुद्ध नगर, उत्तरप्रदेश: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने और भ्रामक जानकारी साझा करने के कारण आईटी एक्ट के तहत दर्ज.
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश: सार्वजनिक शांति भंग करने के इरादे से दिए गए बयानों और स्थानीय क्षेत्र में भय का माहौल पैदा करने के आरोप में स्थानीय निवासियों की शिकायत पर दर्ज.
ऐसे ही भड़काऊ बयान उत्तरप्रदेश की ज्ञानवापी मस्जिद के खिलाफ केस लड़ने वाले वकील हरिशंकर जैन के भी सुने जा सकते हैं. इस वीडियो में हरिशंकर कहते दिख रहे हैं कि जहां मुस्लिम बहुसंख्यक होते हैं, वहां से हिंदुओं को पलायन करना पड़ता है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकील अरीब उद्दीन अहमद कहते हैं,
लिस्ट में अगला नाम भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय का है. जो एक मस्जिद के बजाय उन कानूनों को चुनौती देते हैं जो इन संरचनाओं को सुरक्षा प्रदान करते हैं. जैसे कि 'प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991'. यह कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था, उसे बदला नहीं जा सकता.
वक्फ कानूनों को भी अश्विनी उपाध्याय अदालत में चुनौती देते रहे हैं. उनका दावा है कि वक्फ एक्ट बोर्ड को किसी भी संपत्ति को 'वक्फ' घोषित करने की शक्ति देता है, जिसे कोर्ट में चुनौती देना बहुत कठिन है.
धार्मिक स्थलों को सुरक्षा देने वाले प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के खिलाफ कोर्ट में लड़ाई लड़ रही अगली वकील हैं रंजना अग्निहोत्री. रंजना मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि–शाही ईदगाह मस्जिद विवाद में प्रमुख याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं. उनकी याचिका को लेकर मामला मथुरा अदालत से आगे बढ़कर हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है.
2020 में कृष्ण जन्मभूमि से जुड़ी याचिका दायर करते समय, रंजना अग्निहोत्री ने दावा किया था कि ''शाही ईदगाह मस्जिद ठीक उसी स्थान पर बनाई गई थी जहां कृष्ण का जन्म हुआ और मुगल काल के दौरान इस पर जबरन कब्जा किया गया था."
दूसरे पक्ष का कहना है कि 17वीं शताब्दी की संरचना के लिए "अतिक्रमण" जैसे शब्दों का उपयोग करना इतिहास का अत्यधिक सरलीकरण है, जिसका मकसद सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काना है. वे मंदिर और मस्जिद के बीच 1968 के समझौते का हवाला देते हैं, जो एक व्यवस्थित और शांतिपूर्ण समझौते का सबूत है.
यहां तक कि कुछ हिंदू संगठनों (जैसे श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान) ने भी शुरुआत में खुद को रंजना अग्निहोत्री से अलग कर लिया था. उन्होंने सुझाव दिया था कि रंजना का उनका कानूनी हस्तक्षेप गैर जरूरी है और चेतावनी दी कि इससे उस शहर में "वातावरण खराब" हो सकता है और "सांप्रदायिक अशांति" पैदा हो सकती है.
मथुरा, संभल, अजमेर जैसे देशव्यापी विवादों से हटकर अलग एक बार उन खबरों को देखें, जो राष्ट्रीय सुर्खियां नहीं बन पातीं. तो पता चलता है कि विवाद कई बार बेबुनियाद होते हैं. जैसे कि उत्तरकाशी की मस्जिद का ये मामला. इस मामले में तो प्रशासनिक कार्रवाई से पहले जांच कर ली गई. कई मामले ऐसे देखे गए जहां प्रशासन ने कार्रवाई से पहले जांच करना या तो नहीं समझा या फिर धार्मिक स्थल के लीगल होने के बाद भी कार्रवाई हुई.
उत्तरकाशी मस्जिद विवाद 2024 : मस्जिद की वैधता को लेकर साल 2024 के आखिर में 'संयुक्त सनातन धर्म रक्षक संघ' जैसे संगठनों ने आरोप लगाया कि यह ढांचा सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बना है. जिला प्रशासन और राजस्व विभाग ने मामले की जांच के बाद स्पष्ट किया कि मस्जिद दस्तावेजों के अनुसार पूरी तरह से वैध है. जिलाधिकारी की रिपोर्ट में कहा गया कि यह मस्जिद 1969 में खरीदी गई निजी भूमि पर स्थित है और 1987 से वक्फ बोर्ड में पंजीकृत है.
कुशीनगर की मदनी मस्जिद 2024 : 2024 में मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज हुई की मस्जिद अवैध जमीन पर बनी है. SDM ने रिपोर्ट दी कि निर्माण स्वीकृत नक्शे और निजी जमीन पर है. हालांकि, बाद में इस अधिकारी का ट्रांसफर कर दिया गया और नए प्रशासन ने इसे अवैध घोषित कर दिया. 9 फरवरी 2025 को, हाई कोर्ट का स्टे खत्म होते ही प्रशासन ने बिना 15 दिन का अग्रिम नोटिस दिए मस्जिद के अगले हिस्से को ध्वस्त कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट की फटकार: फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपनी गाइडलाइन्स का उल्लंघन और "घोर अवमानना" माना. कोर्ट ने कुशीनगर के DM को नोटिस जारी कर जवाब मांगा कि उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए.
अखूंदजी मस्जिद : दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने इस ऐतिहासिक मस्जिद को सल्तनत काल का बताते हुए भी 'अवैध अतिक्रमण' करार दिया. आरोप है कि बिना किसी पूर्व नोटिस के तड़के सुबह इसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया. मस्जिद कमेटी के अनुसार यह मस्जिद और वहां स्थित मदरसा 700 साल पुराने थे और वक्फ बोर्ड में पंजीकृत थे. दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई और DDA से तीखे सवाल पूछे कि बिना किसी स्पष्ट सूचना या आदेश के इतनी पुरानी संरचना को कैसे गिरा दिया गया?
गरीब नवाज मस्जिद : बाराबंकी के रामसनेही घाट में स्थित इस मस्जिद को प्रशासन ने रातों-रात तुड़वा दिया था. अफसरों का कहना था कि यह कोई धार्मिक जगह नहीं बल्कि सरकारी जमीन पर बना एक "अवैध घर" है. वक्फ बोर्ड के पास इसके पक्के कागज थे कि यह मस्जिद 1960 के दशक से वहां मौजूद थी और सरकारी रिकॉर्ड (Waqf) में दर्ज थी. जब यह मामला अदालत पहुंचा, तो इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई. कोर्ट ने साफ कहा कि यह ताकत का गलत इस्तेमाल है.
प्रशासन की कार्रवाई के बाद कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका में वक्फ के वो सभी दस्तावेज दिखाए गए हैं, जिनमें मस्जिद का उल्लेख है. जिस कब्रिस्तान को प्रीत सरोही के संगठन सेव इंडिया फाउंडेशन ने अवैध बताया. 1970 के वक्फ गजट में मस्जिद के पास स्थित उस कब्रिस्तान का भी जिक्र है.
वक्फ के 1970 के गजट नोटिफिकेशन में ये जिक्र है कि उस वक्त फैज-ए-इलाही मस्जिद और दरगाह 100 साल पुराने थे.
कोर्ट में फैज-ए-इलाही मस्जिद मामले की वकील सीमा शर्मा और वरिष्ठ अधिवक्ता जतन सिंह ने बताया कि
भारत में किसी भी धार्मिक स्थल को गैरकानूनी या कानूनी करार देना एक आसान प्रक्रिया नहीं है. इसके पीछे कई जटिलताएं हैं. कुछ आसान पॉइंट्स से समझने की कोशिश करते हैं.
लॉ फर्म शानमुगम एसोसिएट्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब 8.7 लाख वक्फ संपत्तियां हैं. ये संपत्तियां लगभग 38 लाख एकड़ जमीन में फैली हुई हैं और इनकी अनुमानित कीमत करीब ₹1.2 लाख करोड़ बताई जाती है.
लेकिन रिपोर्ट कहती है कि इन संपत्तियों में से बड़ी संख्या के पास पर्याप्त कानूनी दस्तावेज़ नहीं हैं. करीब 50 प्रतिशत वक्फ जमीन की कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं है. इसी वजह से इन जमीनों को लेकर अक्सर विवाद और कोर्ट केस होते रहते हैं.
ज्यादातर पुराने धार्मिक स्थलों के पास जमीन की पक्की रजिस्ट्री या टाइटल डीड नहीं होती. वे अक्सर सिर्फ ब्रिटिश समय के राजस्व रिकॉर्ड, जैसे जमाबंदी या खसरा, पर ही निर्भर रहते हैं. सूरज भान बनाम फाइनेंशियल कमिश्नर जैसे मामलों में अदालतें साफ कह चुकी हैं कि ये रिकॉर्ड सिर्फ टैक्स वसूली के लिए बनाए जाते थे, इन्हें मालिकाना हक का ठोस सबूत नहीं माना जा सकता.
ऐसे में जब किसी धार्मिक संस्था के पास रजिस्ट्री नहीं होती, तो उसे “एडवर्स पजेशन” जैसे मुश्किल कानूनी नियमों के जरिए अपना हक साबित करना पड़ता है. यही वजह है कि ऐसे मामलों में कानूनी लड़ाई और जटिल हो जाती है.
धार्मिक स्थलों, खासकर मस्जिदों को लेकर चल रहे कानूनी विवादों पर संविधान विशेषज्ञ फैज़ान मुस्तफा ने कई बार यह कहा है कि ऐसे विवादों का समाधान केवल अदालतों के जरिए तलाशना सही नहीं है. आउटलुक पर छपे जनवरी 2024 के लेख में फैज़ान मुस्तफा कहते हैं.
मस्जिद, दरगाह, कब्रिस्तान की खिलाफ दावे करने वाले एक्टिविस्ट अक्सर इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं. ये शब्द सोशल मीडिया पर लंबे समय से इस्तेमाल होता रहा है. "लैंड जिहाद" जैसे शब्दों और नैरेटिव को मेनस्ट्रीम में लाने वाले चेहरे अक्सर हेट स्पीच देते पाए जाते हैं.
इस नैरेटिव का मूल दावा है कि एक धर्म विशेष के लोग देश की सरकारी जमीन या मंदिरों की जमीन पर कब्जा करने के लिए वहां मस्जिद या दरगाह बनाते हैं. मामला सिर्फ धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं है, कई बार आरोप ये भी लगाया जाता है कि जहां मुस्लिम आबादी बढ़ रही हो वो लैंड जिहाद नाम की प्लानिंग के तहत ही बढ़ रही है.
हमारी पिछले साल की इस रिपोर्ट में आप देख सकते हैं कि कैसे कथित लैंड जिहाद और लव जिहाद के खिलाफ एक आंदोलन छेड़ा गया. नतीजा ये हुआ कि एक अफवाह के चलते एक समुदाय के सभी लोगों को एक कस्बा छोड़कर जाना पड़ा.
सुरेश चव्हाणके (Sudarshan News): इन्होंने अपने टीवी शो 'बिंदास बोल' के जरिए इस नैरेटिव को राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया और मजारों व मस्जिदों के निर्माण को एक सुनियोजित "ज़मीन कब्जाने की साजिश" के रूप में पेश किया.
पुष्कर सिंह धामी (मुख्यमंत्री, उत्तराखंड): इन्होंने सरकारी तौर पर उत्तराखंड में मजारों को हटाने की मुहिम चलाई और सार्वजनिक घोषणा की कि राज्य में "लैंड जिहाद" को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
हिमंता बिस्वा सरमा (मुख्यमंत्री, असम): असम में अतिक्रमण हटाने की बड़ी कार्रवाइयों को सांस्कृतिक सुरक्षा से जोड़ते हुए इसे "लैंड जिहाद" के खिलाफ एक निर्णायक जंग करार दिया.
विष्णु शंकर जैन (अधिवक्ता): ये कई मंदिर-मस्जिद कानूनी विवादों में हिंदू पक्ष के वकील हैं और अक्सर वक्फ कानून को "लैंड जिहाद" को बढ़ावा देने वाला एक कानूनी हथियार बताते हैं.
कपिल मिश्रा (भाजपा नेता): इन्होंने दिल्ली में सड़कों और पार्कों में बनी मजारों के खिलाफ सोशल मीडिया पर सक्रिय अभियान चलाकर इन्हें "लैंड जिहाद" का हिस्सा बताया और इन्हें हटाने की मांग को जन-आंदोलन बनाने की कोशिश की.
यति नरसिंहानंद (महंत, डासना): ये अपनी विवादास्पद बयानबाजी के लिए चर्चित हैं और अक्सर हिंदू आबादी वाले इलाकों में गैर-हिंदुओं द्वारा ज़मीन खरीदने को "लैंड जिहाद" की रणनीति का हिस्सा बताते हैं.
टी राजा सिंह : तेलंगाना के भाजपा विधायक टी. राजा सिंह अक्सर रैलियों में नफरती भाषा का इस्तेमाल करते हुए "लव जिहाद" और "लैंड जिहाद" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए भाषण देते हैं.
काजल हिंदुस्तानी : अक्टूबर 2024 में ठाणे पुलिस ने काजल हिंदुस्तानी के खिलाफ FIR दर्ज की. उन्होंने वक्फ बोर्ड को "लैंड जिहाद" बताते हुए मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार और विभाजनकारी टिप्पणियां की थीं.
वकील अरीब उद्दीन अहमद इस सवाल के जवाब में बताते हैं कि,
यदि कोई संपत्ति आधिकारिक तौर पर वक्फ भूमि के रूप में दर्ज है, तो प्रशासन चाहकर भी इन संपत्तियों को कानून की अनदेखी कर नहीं हटा सकता. ऐसी स्थिति में प्रभावित पक्ष के पास ये ऑप्शन मौजूद हैं.
वक्फ ट्रिब्यूनल : वक्फ अधिनियम की धारा 83 के तहत, वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों को सुलझाने का विशेष अधिकार 'वक्फ ट्रिब्यूनल' के पास है. बुल्डोजर एक्शन की स्थिति में, सिविल जज या सीधे ट्रिब्यूनल में 'अस्थायी निषेधाज्ञा' (Temporary Injunction) के लिए आवेदन किया जा सकता है, जिससे तोड़फोड़ पर तत्काल रोक लग सकती है.
हाई कोर्ट में रिट याचिका: संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की जा सकती है. इसमें प्रशासन की कार्रवाई को मनमाना और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी जा सकती है.
अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया: प्रशासन किसी भी वक्फ संपत्ति को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के नहीं गिरा सकता. इसमें संपत्ति के मालिक को विधिवत नोटिस देना, उनकी दलीलें सुनना और वक्फ अधिनियम के प्रावधानों का पालन करना अनिवार्य है.