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‘मोमाकू’ रिव्यू: एक ATM, एक रात और पितृसत्ता की कहानी

एटीएम चोरी और सस्पेंस के जरिए 'मोमाकु' फिल्म मनोरंजन के साथ घटते लिंग अनुपात व गंभीर सामाजिक मुद्दों को उठाती है.

Nitya Choubey
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<div class="paragraphs"><p>हरियाणवी फिल्म MOMACU और समाज की तस्वीर</p></div>
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हरियाणवी फिल्म MOMACU और समाज की तस्वीर

(फोटो- मोमाकू पोस्टर)

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क्या होता है जब किसी गांव में काफी मशक्कत के बाद पहली बार पैसे निकालने के लिए एक एटीएम लगे और फिर वो एटीएम रातों-रात चोरी हो जाए? गंगाजल, अब तक छप्पन, अपहरण जैसी फिल्मों से नाम कमा चुके यशपाल शर्मा स्टारर फिल्म 'मोमाकु (मोटर माचिस और कटर)' की शुरुआत तो इसी घटना से होती है, लेकिन कहानी कॉमेडी के साथ-साथ लिंग भेद, बदहाल अस्पताल की व्यवस्था और बेरोजगारी जैसे बड़े मुद्दों को भी करीब से दिखाती है.

जून 2026 में केबलवन पर रिलीज हुई ये 'मोमाकु' हरियाणवी सिनेमा की अलग तस्वीर पेश करती है. ऐसी फिल्में क्षेत्रीय सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम न बनाकर, समाज को करीब से देखने और समझने का एक जरिया बना रही हैं.

ग्रामीण भारत की तस्वीर?

हाल ही में हरियाणा सरकार द्वारा जारी जन्म के समय लिंग अनुपात के आंकड़ों में चिंताजनक गिरावट दर्ज की गई है. 2026 के पहले चार महीनों के आंकड़े बताते हैं कि राज्य का लिंग अनुपात पिछले साल के 925 से घटकर 895 रह गया है. इनमें हरियाणा के चरखी दादरी जिले का अनुपात सबसे कम दर्ज किया गया (हर 1000 लड़कों पर केवल 769 लड़कियां).

इसी चरखी दादरी से लगभग 160 किलोमीटर दूर स्थित शकर मंदोरी गांव में 'मो मा कु' ने आकार लिया. कहानी के केंद्र में जतिन सरना द्वारा निभाया गया सुनील भाईसाहब का किरदार है, जिसकी सबसे बड़ी चिंता अपनी गर्भवती पत्नी की सुरक्षित डिलीवरी है. लेकिन गांव से कई किलोमीटर दूर स्थित प्राइवेट अस्पताल तक पहुंचना जितना मुश्किल है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल इलाज का खर्च जुटाना है. ऐसे में उसे एक ही तरकीब सूझती है: गांव की नई और इकलौती एटीएम मशीन की चोरी. यहीं से फिल्म अपना सस्पेंस बुनना शुरू करती है.

दूसरी ओर, सरपंच की युवा बेटी, गुलाबो, अपने प्रेमी के साथ भागने की तरकीब खोज रही है. वह जानती है कि एक बार घर छोड़ने का फैसला कर लेने के बाद उसके लिए वापसी का कोई रास्ता नहीं बचेगा. एक्ट्रेस अपूर्व अरोरा द्वारा निभाया गया गुलाबो का किरदार इस बात को अच्छी तरह समझता है कि उसका स्वच्छंद प्रेम पिता की पगड़ी और पुरुष-प्रधान समाज को एक खुली चुनौती है.

दोनों की कहानी आकर रुकती है एक ट्यूबवेल के कमरे में, जिसके अंदर पूरी रात चलती है एटीएम की भारी मशीन को काटने की जद्दोजहद. कुलदीप कुणाल के लेखन और निर्देशन में बनी यह हरियाणवी फिल्म डार्क कॉमेडी और क्राइम थ्रिलर के बीच अपनी जगह बनाती है. फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसका हास्य किसी अलग से डाले गए कॉमेडी ट्रैक से नहीं आता, बल्कि किरदारों और उनकी मजबूरियों से पैदा होता है.

कहानी के खुलने के साथ-साथ गांव के अंदर की परिस्थितियों की भी समझ मिलती है. 'मो मा कु' बार-बार हरियाणा-पंजाब क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति पर करारी टिप्पणी करती है. फिल्म के कई सीन इसी टिप्पणी पर आधारित हैं, जैसे ट्यूशन में लड़के और लड़कियों को साथ पढ़ाने पर सरपंच द्वारा अध्यापक की पिटाई, या फिर बेटी के घर से भाग जाने के बाद उसकी मां का खुद को जूतों से मारना, या कहानी के विलन के अभद्र बर्ताव में बदलाव.. जैसे ही उसे पता चलता है कि उसके सामने खड़ी लड़की उसी के घर की है.

‘मोमाकू’ का ग्रामीण परिवेश भी इसकी ताकत है. फिल्म गांव को किसी खूबसूरत पोस्टकार्ड की तरह पेश नहीं करती. यहां लोग अपनी भाषा में बात करते हैं, गालियां देते हैं, झगड़ते हैं, डरते हैं और अपनी जरूरत के हिसाब से फैसले लेते हैं. वैसे तो हिंदुस्तानी फिल्मों में गांव-देहात को देखना एक आम बात है, लेकिन जिस तरह क्षेत्रीय या इंडिपेंडेंट सिनेमा गांव को पर्दे पर उतारता है, उसमें एक गहराई होती है. फिल्म में गुलाबो का किरदार टोपा और शाल में ही नजर आती हैं, जैसा कि हरियाणा के गांव की आम महिलाएं दिख जाएंगी.

5 करोड़ की लागत से बनी यह फिल्म बिना किसी ग्रीन स्क्रीन का इस्तेमाल किए, पंजाब के मलापुर गांव और हरियाणा के शकर मंदोरी में शूट हुई है. इसीलिए देखने वाले को लगभग ऐसा लगता है जैसे उसने उत्तर भारत के खेतों में कदम रख दिया हो. फिल्म में दिखाए जाने वाले खेत, उनमें छाया कोहरा, बुदबुदाता हुक्का, लठमार भाषा और लोगों का पहनावा भी विश्वसनीय लगने लगता है. गांव की परिस्थिति ने फिल्म को कहानी का मजबूत आधार दिया.

यशपाल शर्मा सरपंच सतबीर के किरदार में प्रभाव छोड़ते हैं. उनके किरदार में गांव की सत्ता, पिता का गुस्सा और बेटी को लेकर चिंता एक साथ दिखाई देती है.

निर्माता कुलदीप कुणाल कहते हैं:

पूरा गांव एक इंसान की तरह फिल्म में जुड़ा और उसमें रहने वाले लोगों ने, जिसमें कई महिलाएं भी आती हैं, बहुत साथ दिया. फिल्म का एक अहम सीन, जगराता, तभी शूट हो पाया जब लोगों ने सालों से बेकार पड़ी जमीन का एक टुकड़ा पूरा साफ कर दिया. कुछ औरतों ने फिल्म में बिना घूंघट के दिखाए जाने की अनुमति भी दी, जो वैसे बेहद मुश्किल है.
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निर्देशक कुणाल ये भी बताते हैं कि फिल्म के भक्तिमय गाने बहुत हद तक हरियाणा के लोक गीतों से प्रेरित हैं.

ऐसा कहना कि रीजनल सिनेमा कम व्यापार करता है, गलत होगा. खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों में. हालांकि हरियाणवी सिनेमा की शुरुआत थोड़ी धीमी रही, 1968 में आई फिल्म धरती के साथ. यह बात मानने वाली है कि राष्ट्रीय स्तर पर उसका उभरना हिंदी भाषा की फिल्मों की तुलना में कम रहता है. और यदि क्षेत्रीय सिनेमा इंडिपेंडेंट हो, तो और कम.

कुणाल से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया,

हमने फिल्म को लोगों से जुड़ा हुआ और ज्यादा से ज्यादा हरियाणवी बनावट के मद्देनजर बनाया है. मेरे हिसाब से जो भी फिल्म लोगों की कहानी बताती है, वह आगे जाकर लोकप्रिय बन जाती है, और शायद कमर्शियल सक्सेस भी. इस फिल्म को लोगों तक पहुंचने में उनका सबसे ज्यादा योगदान है जिन्होंने ये फिल्म देखी और आगे लोगों को इसके बारे में बताया.

एटीएम मतलब विकास?

मोमाकु में दिलचस्प यह है कि एटीएम यहां सिर्फ एक मशीन नहीं है. वह गांव के लिए आधुनिक सुविधा और आर्थिक उम्मीद का प्रतीक भी है. जिस गांव में बैंक तक पहुंच या नकदी की उपलब्धता आसान नहीं, वहां एटीएम का लगना विकास की निशानी माना जाता है. लेकिन उसी एटीएम का चोरी हो जाना फिल्म को एक विडंबनापूर्ण स्थिति में डाल देता है- जिस सुविधा का इंतजार गांव ने किया, वही अपराध की वजह बन जाती है.

इस फिल्म में भी कमियां हैं, ये हर जगह उतनी संतुलित नहीं रहती. कई जगहों पर इसकी कहानी जरूरत से ज्यादा किरदारों और उलझनों को एक साथ संभालने की कोशिश करती महसूस होती है. डार्क कॉमेडी और थ्रिल के बीच लगातार आवाजाही कभी-कभी कहानी की स्पीड पर असर डालती है.

लेकिन जिस ग्रामीण यथार्थ को फिल्म पकड़ना चाहती है, उसमें कड़वी भाषा कई जगह स्वाभाविक भी लगती है.

कुणाल कहते हैं कि क्षेत्रीय सिनेमा को अपने चेहरे बनाने चाहिए, और उन्हें फिल्म में कास्ट करना चाहिए. इसके साथ-साथ कम पूंजी लगाकर फिल्म की कहानी पर ज्यादा मेहनत करनी चाहिए. धीरे ही सही, फिल्म लोगों तक जरूर पहुंच सकती है.

जहां बड़े पर्दे तक पहुंचना सिर्फ कुछ क्षेत्रीय सिनेमा के लिए मुमकिन हो पाता है, वहीं 'मो मा कु' जैसी अन्य फिल्में OTT की मदद से लोगों तक पहुंच पाती हैं.

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