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चार साल पहले, अंकिता शाह* के पिता ने खुदकुशी कर ली थी. उनकी मौत के बाद लंबे समय तक, वह सदमे में रहीं और अपने परिवार के साथ के बावजूद अकेलापन महसूस करती थीं. मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल की देखरेख के बाद ही उनकी भावनात्मक दशा में सुधार आया.
भारत में, हर साल खुदकुशी के कारण 2.3 लाख से ज्यादा लोगों की मौत होती है, इसका ये मतलब भी है कि दो लाख से ज्यादा परिवारों की अंकिता जैसी कहानियां हैं. उनकी कहानियां एक जैसे पैटर्न की होती हैं: अकेलापन, शर्म, सामाजिक कलंक और अलगाव, अपराधबोध और बहुत से ऐसे सवाल, जिनका कोई जवाब नहीं होता.
कलंक गहरा होता है और इस तरह की मौत के बाद असंवेदनशील टिप्पणियां आम हैं.
मिलिंद और मनीषा म्हैस्कर ने 2017 में अपने मृत बेटे के नाम एक अखबार में खुला खत लिखा था.
इस तरह की टिप्पणियां बता सकती हैं कि हर कोई म्हैसकर परिवार जितना साफगो क्यों नहीं है. उदाहरण के लिए, अंकिता शुरू में अपने पिता के बारे में बात नहीं करना चाहती थीं, और दोस्तों व परिवार ने भी दूरी बनाए रखी. यही कारण है कि अब वह कहती हैं कि यह खुदकुशी के बारे में बात करने का समय है. अंकिता कहती हैं, “अगर हम अधिक खुले हुए हैं, तो हम लोगों को उनके नुकसान से निपटने में मदद करते हैं और हम शर्म को मिटाने में मदद करते हैं.”
बहुत से लोग जिन्होंने खुदकुशी के कारण अपने किसी प्रिय को खो दिया है, ‘जटिल दुःख’ का सामना करते हैं. सामान्य दु:ख में, एक व्यक्ति धीरे-धीरे अपने नुकसान की सच्चाई को स्वीकार करना और हालात के मुताबिक ढलना शुरू कर देता है. समय के साथ उनका गम मिट जाता है.
लेकिन जटिल दु:ख के मामले में, गमजदा शख्स काफी लंबे समय तक दु:ख के लक्षणों से उबरने में असमर्थ होता है.
सारिका मेहता* पर, छोटी उम्र में अपनी चाची के खुदकुशी करने का असर लंबे समय तक रहा. वह कहती हैं,
खुदकुशी परिवार के भीतर भी दरार पैदा कर सकती है. खुदकुशी के सदमे के मामलों को देखने वाली मनोचिकित्सक डॉ पेरविन दादाचांजी कहती हैं, “परिवार के सदस्य इस बारे में बात किए बिना अवसाद से गुजरते हैं. इससे ड्रग्स का सेवन शुरू हो सकता है और पारिवारिक जीवन का ताना-बाना बिखर सकता है.
कई परिवारों में, मृत व्यक्ति का दोबारा कभी जिक्र नहीं किया जाता है. कविता सिंह*, जिन्होंने किशोरावस्था में अपनी मां को खो दिया, इसी तरह के एक अनुभव को साझा करती है. वह कहती हैं.
अध्ययनों से पता चलता है कि एक करीबी की खुदकुशी कई नकारात्मक स्वास्थ्य और सामाजिक परिणामों से जुड़ी है, जिसमें रिश्ते की नजदीकी के हिसाब से अवसाद और खुदकुशी का एक बढ़ा हुआ जोखिम भी शामिल है. डॉ दादाचांजी बताती हैं, “ऐसे लोगों में एक स्वाभाविक रूप से गमजदा शख्स की तुलना में अवसादग्रस्तता की भावनाओं का गहरा अहसास होता है.”
जब आप एक गमजदा शख्स को सहारा देते हैं, तो आप उनके तनाव को कम करते हैं. डॉ दादाचांजी कहती हैं, “यहां तक कि एक संदेश कि आप बात करने के लिए मौजूद हैं, उन्हें कम आशंकित महसूस करने में मदद कर सकता है.”
अंकिता कहती हैं, “मेरे दोस्तों ने मुझे अपने पिता की अच्छी बातों की याद दिलाकर मदद की, जिन्हें मैंने उनकी मौत के तरीके के कारण ब्लॉक कर दिया था."
कविता का मानना है कि सुनना और सब्र सबसे महत्वपूर्ण है. “बिना जज बने सुनना महत्वपूर्ण है. यह समझें कि अपराधबोध है और यह कहना कि वह जिम्मेदार नहीं है, मदद नहीं करता है. और उसे ठीक होने के लिए वक्त दें- इसमें कई साल लग सकते हैं.
जून 2018 में, भारत सरकार ने मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 को अधिसूचित किया, जो खुदकुशी को अपराध की श्रेणी से बाहर घोषित करता है. लेकिन कलंक को दूर करने के लिए इस मुद्दे पर बात करना जरूरी है.
किस्मत से, कुछ संगठन खुदकुशी के गम से उबरने के लिए अनुकूल उपाय अपना रहे हैं. एक मामला मुंबई के एक स्कूल का है, जिसने डॉ दादाचांजी से उन छात्रों से बात करने के लिए कहा, जिन्होंने सहपाठी खो दिया था.
एक और उदाहरण सारिका के वर्कप्लेस का है. वह बताती हैं, “जब एक कर्मचारी ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली, तो कंपनी ने करीबी सहयोगियों को गम से उबरने में मदद की, और कंपनी के खर्चे पर उन्हें काउंसलिंग सेवा देने की पेशकश की गई.”
अंकिता के अनुसार, मीडिया में खुदकुशी के बारे में सनसनीखेज कहानियां नुकसानदायक हो सकती हैं. वह कहती हैं, “इसके बजाए मीडिया को इस मुद्दे के बारे में एक स्वस्थ चर्चा शुरू करनी चाहिए.”
लोगों को अपने गम को साझा करने के लिए सेफ स्पेस देना बहुत जरूरी है. कविता के अनुसार, मेंटल हेल्थ के बारे में बात करने के लिए इन सेफ स्पेस को कंपनियों, कॉलेजों, अस्पतालों और अन्य संगठनों द्वारा बनाया जाना चाहिए.
डॉ दादाचांजी कहती हैं, “सभी संस्थानों को इस तरह की घटना के बाद मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल्स की एक ब्रीफिंग का आयोजन करना चाहिए.”
सहानुभूतिपूर्ण ढंग से सुनना भी बहुत मददगार हो सकता है. सारिका कहती हैं, "मेरी चाची की मौत के बाद अगर संवेदनशील शिक्षक मिल जाते तो अच्छा होता. कंपनियां संवेदनशीलता के साथ ऐसी बातों पर चर्चा करने के लिए प्रबंधकों को प्रशिक्षित कर सकती हैं.”
ऐसा ही एक सेफ स्पेस एक सपोर्ट ग्रुप हो सकता है. “ऐसे ग्रुप में आप दूसरों से बात करते हैं, जो उन्हीं हालात से गुजर रहे हैं. ये दिल के जख्म भरने में मदद करता है.” अंकिता बताती हैं, जिन्होंने कविता और डॉ दादाचांजी के साथ मिलकर मुंबई में खुदकुशी का गम भुलाने के लिए सपोर्ट ग्रुप We Hear You की स्थापना की है.
सारिका इससे सहमत हैं. वह कहती हैं, “एक सपोर्ट ग्रुप में शामिल होने के कुछ महीनों के भीतर, मैं ग्रुप के दूसरे लोगों के साथ जुड़ गई, क्योंकि हम सभी एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझते थे.”
कविता कहती हैं खुदकुशी के बारे में खुल कर बात करने का वक्त आ गया है, जिसके लिए हमें मेंटल हेल्थ के मुद्दों को बेहतर ढंग से समझना होगा. वह कहती हैं, “इसके अलावा, हमें निर्णायक बनने की बजाए समर्थन की संस्कृति विकसित करने की जरूरत है. हम सभी अपना मामूली योगदान दे सकते हैं.”
* निजता की रक्षा के लिए नाम बदले गए हैं.
खुदकुशी के गम और सपोर्ट ग्रुप्स के बारे में और और पढ़ें: वी हियर यू (मुंबई में स्थित). आप The Health Collective द्वारा जुटाई गई सेफ हेल्पलाइन, मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों की सूची को भी देख सकते हैं.
(रोहिणी कपूर मुंबई में रहने वाली एक लेखिका और ब्लॉगर हैं. वह बुक्स, फूड, फैशन, ट्रैवेल और मेंटल हेल्थ के बारे में लिखती हैं.)
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