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वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने इबोला को ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया है. अब तक 28000 से अधिक लोग इबोला वायरस के संपर्क में आए हैं और 11 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. मरने वालों की संख्या सबसे ज्यादा कांगो में है.
इबोला वायरस के नए प्रकोप में अकेले कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में 2500 से अधिक लोग इसके शिकार हो चुके हैं और अब तक करीब 1700 लोगों की जान जा चुकी है. कांगो में हर दिन इसके तकरीबन 12 नए मामले सामने आ रहे हैं.
यह वायरस अब पड़ोसी देश युगांडा और रावंडा की सीमाओं तक फैल गया है. युगांडा में दो लोगों की मौत भी हो गई है. लगभग 20 लाख की आबादी वाले शहर गोमा में भी वायरस ने दस्तक दे दी है, जिसके बाद विश्व स्वास्थ संगठन को कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा.
ये इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साल 2016 के जून में ही विश्व स्वास्थ संगठन ने इस हेल्थ इमरजेंसी को समाप्त करने की घोषणा कर दी थी.
तो इस वायरस ने फिर से ये खतरनाक रूप क्यों ले लिया है और हालात यहां तक कैसे पहुंचे?
WHO की ओर से वैश्विक स्वास्थ्य इमरजेंसी की घोषणा करने में काफी एहतियात बरता जाता है. इससे पहले अब तक केवल चार बार हेल्थ इमरजेंसी की घोषणा की गई है. 2009 में इन्फ्लूएंजा के लिए; 2014 में पोलियो के दोबारा हो जाने से, पश्चिमी अफ्रीका में 2014-16 में इबोला के कारण और 2016 में जीका वायरस के कारण इमरजेंसी की घोषणा की गई थी.
सहायताकर्मियों ने यह कहते हुए इमरजेंसी की घोषणा के फैसले की सराहना की है कि इससे अंतरराष्ट्रीय समर्थन और फंड इकट्ठा करने में मदद मिलेगी. इससे इबोला के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा स्वास्थकर्मियों को जुटाने, जरूरी चीजें जमा करने और बुनियादी ढांचे को बेहतर करने में मदद मिलेगी.
विश्व स्वास्थ संगठन ने इस साल जनवरी से जुलाई तक $49 मिलियन डॉलर यानी लगभग तीन अरब 37 करोड़ रुपए जुटाए हैं, जो कि इस बीमारी पर काबू पाने के लिए होने वाले खर्च का आधा है.
हालांकि इस बीमारी को वैश्विक स्तर पर जाना जाता है. लेकिन अभी भी इसका खतरा क्षेत्रीय है और इसलिए कोई भी देश अपनी सीमा बंद नहीं करेगा.
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यात्रा या व्यापार पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा और न ही बंदरगाहों या हवाई अड्डों पर इमरजेंसी वाले इलाके के बाहर यात्रियों की खास स्क्रिनिंग होगी.
इस समय दो टीकों का इस्तेमाल किया जाता है. फिलहाल मर्क के द्वारा बनाई गई वैक्सीन इस्तेमाल में है, जिसे 99 प्रतिशत तक असरदार माना जाता है. लगभग एक लाख 61 हजार लोगों ने इबोला का टीका लगा रखा है. मर्क कंपनी का कहना है कि उन्होंने पिछले एक साल में WHO को इस टीके की 195,000 खुराकें दान की हैं. द न्यूयॉर्क टाइम्स के इस लेख के मुताबिक कंपनी का दावा है कि दो लाख 45 हजार खुराक तैयार हैं और अगले 18 महीनों में नौ लाख टीका तैयार कर लिया जाएगा. वैक्सीन के एक बैच को बनाने में लगभग एक साल लगता है.
दूसरा टीका जॉनसन एंड जॉनसन नाम की कंपनी ने तैयार किया है. विशेषज्ञ चाहते हैं कि टीकाकरण के प्रयासों को आगे बढ़ाने में मदद करने के लिए कांगो इस वैक्सीन का भी उपयोग शुरू करे, लेकिन कांगो का स्वास्थ्य मंत्रालय यह कहते हुए कि ‘मर्क ठीक काम करता है’ फिलहाल इसे स्वीकार करने से इनकार कर रहा है.
सभी को टीका नहीं लग पाता है. टीका सिर्फ उन्हें लगाया गया है, जो या तो किसी इबोला वायरस से ग्रसित व्यक्ति से सीधे संपर्क में आए हों और जो लोग उनके संपर्क में आने वाले लोगों के संपर्क में आए हैं.
भरोसा. जी हां स्थानीय लोगों और स्वास्थ्यकर्मियों के बीच विश्वास की कमी एक गंभीर मुद्दा है. स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले की कई घटनाएं हुई हैं और उनकी हत्या तक हुई है. अब तक 198 बार हमले हो चुके हैं और सात स्वास्थ्यकर्मियों की हत्या तक की जा चुकी है.
हिंसा और संघर्ष का इतिहास होने की वजह से हालात और भी गंभीर हो जाते हैं. पिछले हफ्ते ही दो स्वास्थ्यकर्मियों की उनके घर में ही हत्या कर दी गई. आपसी विश्वास में कमी होने के कारण लोग समय रहते अधिकारियों से संपर्क भी नहीं करते हैं. जब तक इबोला के शिकार किसी मरीज को अलग-थलग किया जाता है, तब तक वह पहले से ही कई लोगों के संपर्क में आ चुका होता है.
गोमा के केस में, मरीज एक पादरी था जिसने इबोला प्रभावित क्षेत्रों में कम से कम सात चर्चों में धर्म प्रचार किया था और इबोल ग्रसित मरीजों को शारीरिक रूप से छुआ था. गोमा की यात्रा के दौरान जो कि लोगों के आवागमन का एक प्रमुख केंद्र है, पादरी ने बहुत चालाकी से खुद की जांच किए जाने से बचा लिया.
Published: 18 Jul 2019,06:27 PM IST